← Back to stories

Founders

पिस्टन रिंग

सोइचिरो होंडा एक लोहार के बेटे थे, जिन्हें इंजनों से प्यार हो गया। उनका पहला असली उत्पाद लगभग हर जाँच में फ़ेल हो गया। फिर युद्ध ने उनका कारख़ाना तबाह कर दिया, और जो काम बमों ने शुरू किया था, उसे एक भूकंप ने पूरा कर दिया।

  • 4 मिनट का पाठ
  • Ages 12+
  • Biography
  • 1900s–1960s

ध्यान दें: इस कहानी में युद्ध के समय की बमबारी और एक भूकंप का ज़िक्र है।

इस भाषा में पढ़ें

उस नौजवान ने धातु का एक छोटा-सा छल्ला रोशनी की ओर उठाया। यह एक पिस्टन रिंग थी, वह पतली पट्टी जो इंजन के अंदर पिस्टन के चारों ओर की दरार को बंद करती है। देखने में वह बिल्कुल सही थी।

उन्होंने ऐसी पचास रिंग बनाई थीं और उन्हें जाँच के लिए टोयोटा कंपनी को भेजा था। टोयोटा ने हर एक को परखा। सिर्फ़ तीन ठीक निकलीं।

सोइचिरो होंडा ने उन रिंगों में अपनी बचत, अपनी ताक़त और कई रातों की नींद झोंक दी थी। अब उन्हें एक कड़वी बात पता चली: वे अपने ही काम को ठीक से नहीं समझते थे।

तेल की गंध

सोइचिरो होंडा का जन्म 17 नवंबर 1906 को मध्य जापान में हामामात्सु के पास एक गाँव में हुआ था। उनके पिता लोहार थे जो साइकिलें भी ठीक करते थे, और लड़का औज़ारों, चिंगारियों और ग्रीस के बीच बड़ा हुआ।

जब वे बहुत छोटे थे, तो गाँव से एक मोटर कार गुज़री। वह पहली कार थी जो उन्होंने कभी देखी थी। बाद में उन्हें याद था कि वे उसके पीछे दौड़े थे, और सड़क पर टपके उसके तेल को झुककर सूँघा था।

वे पढ़ाई में अच्छे नहीं थे। डेस्क पर बैठे-बैठे वे बेचैन हो जाते थे, लेकिन उनके हाथ बड़े हुनरमंद थे, और वे फ़ुर्सत का हर घंटा मशीनों के आसपास बिताते थे।

शागिर्द

पंद्रह साल की उम्र में वे घर छोड़कर टोक्यो गए, ताकि आर्ट शोकाई नाम के एक कार मरम्मत गैराज में शागिर्द बन सकें। उन्हें बड़ी निराशा हुई जब वहाँ उनका पहला काम कारें ठीक करना नहीं निकला। उनसे मालिक के बच्चे की देखभाल करने को कहा गया।

उन्होंने वह काम किया, और मैकेनिकों को ध्यान से देखते रहे। धीरे-धीरे उन्हें इंजनों पर काम करने दिया गया, और पता चला कि वे इसमें बहुत माहिर हैं।

1928 में उनके मालिक ने उन्हें हामामात्सु में गैराज की एक शाखा खोलने दी। वह ख़ूब चली। होंडा की उम्र अभी तीस से कम थी, और अच्छी कमाई कर रहे थे। उन्होंने साची से शादी की, जो आगे आने वाले हर दौर में उनके साथ खड़ी रहीं।

फिर से स्कूल

लेकिन दूसरों की मशीनें ठीक करना काफ़ी नहीं था। वे अपनी ख़ुद की कोई चीज़ बनाना चाहते थे। 1930 के दशक में उन्होंने पिस्टन रिंग बनाने की एक कंपनी शुरू की।

तभी नाकामी आई। उनकी रिंगें टूट जातीं, रिसतीं, या फ़िट नहीं होतीं। वे दिन-रात वर्कशॉप में काम करते, कभी-कभी वहीं सो जाते, और फिर भी उन्हें ठीक नहीं बना पाते। टोयोटा की जाँच ने दिखा दिया कि उन्हें अभी कितना आगे जाना है।

तो उन्होंने वह किया जो किसी कारोबार के मालिक के लिए अनोखी बात थी। उन्होंने धातु-विज्ञान, यानी धातुओं के विज्ञान, की पढ़ाई के लिए हामामात्सु के तकनीकी स्कूल में दाख़िला ले लिया। जो कक्षाएँ उनके काम की थीं, उनमें वे जाते, और जो नहीं थीं, उन्हें छोड़ देते। उन्होंने इम्तिहान नहीं दिए, और उन्हें कोई डिप्लोमा नहीं मिला। बाद में वे मज़ाक़ में कहते थे कि डिप्लोमा की क़ीमत सिनेमा के टिकट से भी कम है।

बढ़िया धातुएँ कैसे बनती हैं, यह सीखने के लिए वे पूरे जापान में इस्पात बनाने वालों और विश्वविद्यालयों के पास भी गए। समय के साथ उनकी पिस्टन रिंगें टोयोटा के मानकों पर खरी उतरने लगीं, और उनकी कंपनी उन्हें सप्लाई करने लगी।

बम और भूकंप

फिर दूसरा विश्वयुद्ध आया। उनके कारख़ाने को युद्ध का सामान बनाने में लगा दिया गया, और उनके बहुत-से तजुर्बेकार मज़दूर चले गए। हवाई बमबारी ने उनके कारख़ानों को नुक़सान पहुँचाया। फिर, जब युद्ध ख़त्म होने के क़रीब था, एक ज़ोरदार भूकंप ने पूरे इलाक़े को हिला दिया और उनका एक कारख़ाना ढह गया।

युद्ध ख़त्म हुआ तो जापान खंडहर बन चुका था। होंडा ने अपने पिस्टन रिंग के कारोबार का जो कुछ बचा था, वह टोयोटा को बेच दिया।

वे लगभग चालीस के थे, और उन्होंने जो कुछ बनाया था, लगभग सब खो चुके थे। क़रीब एक साल तक उन्होंने लंबा आराम किया, दोस्तों के साथ वक़्त बिताया और सोचते रहे कि आगे क्या करें।

इंजन वाली साइकिलें

1946 में उन्होंने एक छोटी-सी वर्कशॉप खोली, जिसे उन्होंने होंडा टेक्निकल रिसर्च इंस्टीट्यूट नाम दिया। जापान की सड़कें साइकिल सवारों से भरी थीं, और पेट्रोल मुश्किल से मिलता था। होंडा को ऐसे छोटे इंजनों का एक ज़ख़ीरा मिला जिन्हें सेना रेडियो के उपकरण चलाने के लिए इस्तेमाल करती थी, और उन्होंने उन्हें साइकिलों पर लगा दिया।

वे शोर करती थीं और धुआँ छोड़ती थीं, लेकिन चलती थीं, और लोग उन्हें ख़रीदने के लिए क़तार लगाने लगे। जब सेना के इंजन ख़त्म हो गए, तो उन्होंने अपना इंजन ख़ुद डिज़ाइन किया।

1948 में उन्होंने होंडा मोटर कंपनी की नींव रखी। अगले साल उनके साथ ताकेओ फ़ुजिसावा जुड़े, एक कारोबारी जिन्होंने बिक्री और पैसों का काम सँभाला, ताकि होंडा वह कर सकें जो उन्हें सबसे प्यारा था: इंजन बनाना। 1958 में कंपनी ने सुपर कब नाम की एक छोटी, मज़बूत मोटरसाइकिल पेश की, जो इतनी सरल और भरोसेमंद थी कि आगे चलकर इतिहास में सबसे ज़्यादा बनाई गई मोटर गाड़ियों में से एक बन गई।

होंडा ने बाद में कहा कि कामयाबी नाकामी और आत्म-चिंतन से आती है, और उनका ज़्यादातर काम नाकामी ही रहा था। 5 अगस्त 1991 को, चौरासी साल की उम्र में, उनका निधन हो गया।

और पढ़ना चाहते हैं?

सोल सैंडर्स की Honda: The Man and His Machines एक जीवंत जीवनी है, जो होंडा के जीते-जी लिखी गई थी। तेत्सुओ साकिया की Honda Motor कंपनी की कहानी और होंडा व फ़ुजिसावा की साझेदारी के बारे में बताती है।

Read next

FoundersBiography

Sixty-Five and Starting Over

At an age when most people retire, Harland Sanders lost the roadside restaurant he had spent twenty-five years building. He had a pension cheque, an old car and a recipe for fried chicken. So he started again.

4 min readAges 12+1890s–1980s
FoundersBiography

From Petrol Pump to Reliance

A schoolteacher's son from a Gujarat fishing village went to work as a clerk in a hot foreign port. He came home with a little money, a rented room and an idea. What he built changed how ordinary Indians thought about owning a share of a company.

4 min readAges 12+1930s–2000s
FoundersBiography

Seven Friends and Ten Thousand Rupees

In 1981, seven young engineers in Pune started a software company with ten thousand rupees, borrowed from one founder's wife. For years they had no money, few clients and endless government paperwork. This is how Infosys began.

4 min readAges 12+1980s–1990s