टेल्को के नाम एक पोस्टकार्ड
1974 में बैंगलोर की एक युवा इंजीनियरिंग छात्रा ने नौकरी का एक विज्ञापन देखा, जिसके आख़िर में लिखा था: "महिला उम्मीदवार आवेदन न करें।" उसे ग़ुस्सा आया, और उसने इसके बारे में कुछ किया। उसने जे. आर. डी. टाटा को एक पोस्टकार्ड लिखा।
- 4 मिनट की कहानी
- Ages 11+
- True story
- 1970s
यह नोटिस बैंगलोर के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस के एक गलियारे में बोर्ड पर लगा था। साल था 1974, और सुधा कुलकर्णी नाम की एक युवती उसे पढ़ने के लिए रुकी।
यह टेल्को, यानी टाटा इंजीनियरिंग एंड लोकोमोटिव कंपनी, का नौकरी का विज्ञापन था, जो भारत की सबसे बड़ी इंजीनियरिंग कंपनियों में से एक थी। कंपनी को ऐसे युवा, होशियार और मेहनती इंजीनियर चाहिए थे जिनका पढ़ाई का रिकॉर्ड शानदार हो।
सबसे नीचे एक और लाइन थी: "महिला उम्मीदवार आवेदन न करें।"
बैंगलोर की एक छात्रा
सुधा कंप्यूटर साइंस में पोस्टग्रेजुएट की पढ़ाई कर रही थीं। वे उत्तर कर्नाटक में अध्यापकों और डॉक्टरों के एक परिवार में पली-बढ़ी थीं, और उन्होंने हुबली में इंजीनियरिंग उस ज़माने में पढ़ी थी जब बहुत कम लड़कियाँ ऐसा करती थीं। उन्होंने अपनी यूनिवर्सिटी में पहला स्थान पाया था, और अब वे इंस्टिट्यूट की गिनी-चुनी औरतों में से एक थीं।
वे तो नौकरी करने की सोच भी नहीं रही थीं। उन्हें अमेरिका में डॉक्टरेट की पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप मिली थी, और उनका इरादा वहाँ जाने का था।
लेकिन नोटिस की उस आख़िरी लाइन ने उन्हें आग-बबूला कर दिया। ऐसा लगता था मानो उनकी सारी मेहनत और सारे नतीजों की कोई क़ीमत नहीं, सिर्फ़ इसलिए कि वे एक औरत थीं।
एक पोस्टकार्ड
उन्होंने कंपनी के मुखिया से शिकायत करने का फ़ैसला किया। उन्हें ठीक-ठीक नहीं पता था कि टेल्को कौन चलाता है, लेकिन यह पता था कि पूरे टाटा समूह की अगुवाई जे. आर. डी. टाटा करते थे, जो उद्योगपति थे और भारतीय विमानन के अग्रदूत भी। इसलिए उन्होंने एक पोस्टकार्ड ख़रीदा और उन्हें लिखा।
उनका संदेश छोटा और सीधा था। उन्होंने याद दिलाया कि टाटा हमेशा से राह दिखाने वाले रहे हैं। उन्होंने भारत के कुछ पहले बड़े उद्योग खड़े किए थे, इस्पात, बिजली और रसायन के, और उन्हें शिक्षा की फ़िक्र रही थी। बल्कि जिस इंस्टिट्यूट में वे पढ़ रही थीं, वह ख़ुद जमशेदजी टाटा की दूरदृष्टि और उदारता से बना था। उन्होंने लिखा कि उन्हें हैरानी है कि ऐसी कंपनी लोगों को उनके स्त्री या पुरुष होने के आधार पर लौटा सकती है।
उन्होंने पोस्टकार्ड डाक में डाला और उसके बारे में लगभग भूल गईं।
इंटरव्यू
कोई दस दिन बाद एक टेलीग्राम आया। टेल्को ने उन्हें इंटरव्यू के लिए पुणे वाले अपने प्लांट में बुलाया था, और आने-जाने का ख़र्च देने की पेशकश की थी।
हॉस्टल की सहेलियों ने उन्हें छेड़ा। उन्होंने कहा कि फिर भी जाओ: मुफ़्त का सफ़र है, और पुणे से कुछ अच्छी साड़ियाँ ख़रीद लेना। तो वे चली गईं।
जब वे इंटरव्यू वाले कमरे में दाख़िल हुईं, तो पैनल में छह लोग बैठे थे। उन्हें एहसास हुआ कि मामला गंभीर है। उन्होंने किसी को फुसफुसाते सुना कि यही वह लड़की है जिसने जेआरडी को चिट्ठी लिखी थी।
उन्होंने उनसे तकनीकी विषयों पर कठिन सवाल पूछे, और उन्होंने अच्छे जवाब दिए। फिर पैनल के एक बुज़ुर्ग सदस्य ने काफ़ी नरमी से समझाया कि कंपनी ने कारख़ाने के फ़्लोर के लिए कभी औरतों को क्यों नहीं रखा। उन्होंने कहा कि यह खुरदुरा, कड़ी मेहनत वाला काम है, और उन्हें नहीं पता कि एक औरत इसे कैसे सँभालेगी।
सुधा ने जवाब में कुछ ऐसा कहा कि हर बदलाव को कहीं न कहीं से शुरू होना होता है। अगर कोई कंपनी कभी किसी औरत को मौक़ा ही न दे, तो कोई औरत कभी कारख़ाने में काम नहीं कर पाएगी।
उन्हें नौकरी मिल गई। वे टेल्को के पुणे प्लांट में रखी जाने वाली पहली महिला इंजीनियर बनीं।
जेआरडी से मुलाक़ात
बरसों बाद, जब वे बंबई में टेल्को के दफ़्तर में काम कर रही थीं, सुधा की जे. आर. डी. टाटा से आमने-सामने मुलाक़ात हुई। उन्होंने लिखा है कि वह ग़ुस्से भरा पोस्टकार्ड याद करके वे घबराई हुई थीं, लेकिन वे शिष्ट और आत्मीय थे, और उन्होंने कहा कि उन्हें लड़कियों को इंजीनियर बनते देखकर ख़ुशी होती है।
उन्होंने उनके बारे में एक और छोटा-सा क़िस्सा सुनाया है। एक शाम वे दफ़्तर के बाहर अपने पति, नारायण मूर्ति, का इंतज़ार कर रही थीं, जिन्हें उन्हें लेने आने में देर हो गई थी। अँधेरा हो रहा था, और दफ़्तर ख़ाली हो रहा था। जे. आर. डी. टाटा ने उन्हें अकेले खड़े देखा, पूछा कि वे वहाँ क्यों हैं, और उनके पति के आने तक उनके साथ इंतज़ार करते रहे। फिर उन्होंने मूर्ति से नरमी लेकिन दृढ़ता से कहा कि अपनी पत्नी को फिर कभी इस तरह इंतज़ार मत कराना।
क्या बदला
सुधा मूर्ति, जैसा आगे उनका नाम हुआ, ने कुछ साल बाद टेल्को छोड़ दी, जब उनके पति और उनके दोस्तों ने इंफ़ोसिस नाम की एक छोटी-सी सॉफ़्टवेयर कंपनी शुरू की। आगे चलकर उन्होंने इंफ़ोसिस फ़ाउंडेशन की अगुवाई की, हज़ारों स्कूलों, पुस्तकालयों और अस्पतालों की मदद की, और बच्चों और बड़ों के लिए अंग्रेज़ी और कन्नड़ में बहुत-सी किताबें लिखीं।
टेल्को, जो बाद में टाटा मोटर्स बनी, ने आगे चलकर बहुत-सी महिला इंजीनियरों को नौकरी दी।
इसकी शुरुआत एक ऐसी युवती से हुई जिसने एक नाइंसाफ़ी भरी लाइन को बिना जवाब दिए नहीं छोड़ा, और भारत के सबसे बड़े कारोबार के शिखर पर बैठे एक व्यस्त आदमी से, जिसने एक छात्रा का पोस्टकार्ड पढ़ा, और उस पर अमल किया।
और पढ़ना चाहते हैं?
सुधा मूर्ति ने यह कहानी ख़ुद अपने निबंध "Appro JRD" में सुनाई है, जो कई जगह दोबारा छपा है, टाटा समूह की ओर से भी। चित्रा बनर्जी दिवाकरुणी की An Uncommon Love सुधा और नारायण मूर्ति की ज़िंदगी के इन बरसों का और विस्तार से ब्योरा देती है।