पोस्टमास्टर
कलकत्ता के एक नौजवान की तैनाती एक सुनसान गाँव के डाकघर में होती है, जहाँ एक अनाथ लड़की उसका घर संभालती है। एक ऐसे रिश्ते की टैगोर की कोमल कहानी, जो एक के लिए दूसरे से कहीं ज़्यादा मायने रखता है।
- 4 मिनट का पाठ
- Ages 12+
- Classic retold
- 1890s
कई दिनों से बारिश हो रही थी। खेतों में दूर-दूर तक पानी भरा था, और उलापुर का छोटा-सा गाँव उस हरी सीलन के बीच किसी टापू जैसा लगता था।
ठहरे पानी के एक तालाब के किनारे, घनी झाड़ियों से सटे एक छप्पर वाले कमरे में, नया पोस्टमास्टर अपनी मेज़ पर बैठा शून्य में ताक रहा था।
वह कलकत्ता का एक नौजवान था। शहर में उसे भीड़, बातचीत और शोर-शराबे की आदत थी। यहाँ उसके पड़ोसी बस पास की एक नील कोठी के बाबू और मज़दूर थे, और उनके पास उसके लिए वक़्त नहीं था। उसे लगता था जैसे किसी मछली को पानी से निकालकर सूखी ज़मीन पर डाल दिया गया हो।
रतन
उसकी तनख़्वाह थोड़ी थी, और वह अपना खाना ख़ुद बनाता था। गाँव की एक लड़की घर के काम में उसका हाथ बँटाने आती थी। उसका नाम रतन था, और वह कोई बारह साल की थी। वह अनाथ थी, और गाँव में किसी को नहीं लगता था कि उसकी कभी शादी होगी।
शाम को, जब गोशालाओं से धुआँ उठने लगता और झींगुर बोलने लगते, पोस्टमास्टर अपने दरवाज़े के बाहर बैठकर आवाज़ लगाता, "रतन!"
रतन बाहर बैठी ठीक इसी पुकार का इंतज़ार कर रही होती। पर वह फ़ौरन दौड़कर अंदर नहीं आती। "बाबू, आपने मुझे बुलाया?"
"क्या कर रही है?"
"रसोई का चूल्हा जलाने जाना है।"
"चूल्हा अभी रहने दे। पहले मेरा हुक़्क़ा भर दे।"
और वह गाल फुलाए, चिलम के कोयलों पर फूँक मारती हुई अंदर आती।
दीये की रोशनी में क़िस्से
धीरे-धीरे पोस्टमास्टर उससे बातें करने लगा। वह अकेला था, और बस वही थी जो उसकी बात सुनती।
वह उसे अपने घर के बारे में बताता: अपनी माँ, अपनी बड़ी बहन, अपने छोटे भाई के बारे में। उस सीलन भरे कमरे में, घर से इतनी दूर बैठकर, वह उन्हें याद करता तो दिल में एक टीस उठती। और रतन सुनती, और अपने ढंग से वह भी कुछ याद करती। वह अपने पिता की बात करती, जो शाम को घर लौटा करते थे, और अपने छोटे भाई की, जिसके साथ वह कभी एक तालाब में डंडी को बंसी बनाकर मछली पकड़ने का खेल खेला करती थी।
जल्द ही वह उसकी माँ और बहन को नाम लेकर पुकारने लगी, जैसे उन्हें ज़िंदगी भर से जानती हो। उसने अपने मन में उसके पूरे परिवार की एक छोटी-सी तस्वीर बना ली थी।
एक दोपहर, जब बादल छँट रहे थे और नरम हवा चल रही थी, पोस्टमास्टर ने सोचा कि कितना अच्छा होता अगर कोई अपना पास होता। ठीक उसी वक़्त उसे रतन की आवाज़ सुनाई दी, और उसने उसे बुला लिया।
"रतन," उसने कहा, "मैं तुझे पढ़ना सिखाऊँगा।"
तो हर दोपहर दोनों वर्णमाला लेकर साथ बैठते। थोड़े ही दिनों में उसने सारे अक्षर सीख लिए और छोटे-छोटे शब्द पढ़ने लगी।
बुख़ार
फिर बारिश पूरे ज़ोर से लौट आई। हर तरफ़ पानी भर गया, और पोस्टमास्टर को बुख़ार ने आ घेरा।
घर से दूर, अपने बिस्तर पर अकेले पड़े-पड़े, वह अपने माथे पर माँ के कोमल हाथ के लिए, या बहन की देखभाल के लिए तरसने लगा।
पर वह ज़्यादा देर अकेला नहीं रहा। रतन अब छोटी लड़की नहीं रही। वह एकाएक नर्स भी बन गई और माँ भी। उसने गाँव के वैद्य को बुलाया, उसे वक़्त पर दवा दी, सारी रात उसके सिरहाने जागती बैठी रही, उसके लिए पथ्य पकाया, और बार-बार पूछती रही, "बाबू, अब थोड़ा अच्छा लग रहा है?"
कुछ दिनों बाद वह उठने-बैठने लायक़ हो गया। पर अब उसका जी भर चुका था। उसने कलकत्ता के अपने दफ़्तर को चिट्ठी लिखकर तबादले की अर्ज़ी भेज दी।
क्या आप मुझे घर ले चलेंगे?
जवाब आया। उसकी अर्ज़ी नामंज़ूर हो गई थी। तो उसने इस्तीफ़ा दे दिया। वह घर जाएगा।
उस शाम, जब रतन अंदर आई, तो उसने कहा, "रतन, मैं कल जा रहा हूँ।"
"कहाँ जा रहे हैं, बाबू?"
"घर।"
"फिर कब लौटेंगे?"
"अब नहीं लौटूँगा।"
रतन ने और कुछ नहीं पूछा। बहुत देर तक बस छप्पर से टपकती बारिश की आवाज़ आती रही।
फिर उसने धीरे से पूछा, "बाबू, क्या आप मुझे अपने साथ घर ले चलेंगे?"
पोस्टमास्टर हँस पड़ा। "यह भी कोई बात हुई!" उसने कहा। उसने यह समझाने की ज़रूरत नहीं समझी कि ऐसा क्यों नहीं हो सकता।
उस पूरी रात, जागते और सोते, रतन के कानों में उसकी वह हँसी और वे शब्द गूँजते रहे।
नदी
सुबह उसने हमेशा की तरह उसके नहाने का पानी तैयार रखा। उसने रतन से कहा कि वह नए पोस्टमास्टर से उसका ध्यान रखने को कह देगा, और उसे चिंता करने की ज़रूरत नहीं। उसने यह भलमनसाहत से ही कहा था। पर रतन फूट-फूटकर रो पड़ी। "नहीं, नहीं," उसने कहा। "आपको मेरे बारे में किसी से कुछ कहने की ज़रूरत नहीं। मैं यहाँ नहीं रहना चाहती।"
जब जाने का वक़्त आया, तो उसने अपनी लगभग सारी तनख़्वाह निकालकर उसकी ओर बढ़ाई। रतन उसके पैरों पर गिर पड़ी। "बाबू," उसने विनती की, "मुझे कुछ मत दीजिए। मेरी चिंता मत कीजिए।" और वह भाग गई।
पोस्टमास्टर अपना थैला और छाता लेकर नदी तक गया, और नाव में बैठ गया।
जब नाव उफनती नदी में आगे बढ़ी, तो उस पर गहरी उदासी छा गई। उसे उस भोली-भाली गाँव की लड़की और उसके दुख का ख़याल आया। एक पल को उसका मन हुआ कि लौट जाए और उस अकेली, बेसहारा बच्ची को अपने साथ ले आए।
पर पाल हवा से भरा था, धारा तेज़ थी, और गाँव पीछे छूटता जा रहा था। उसने ख़ुद को समझाया कि ज़िंदगी बिछड़नों से भरी है। लौटकर क्या फ़ायदा? इस दुनिया में हर कोई किसी से मिल रहा है और किसी को छोड़ रहा है।
रतन के पास ऐसा कोई ख़याल नहीं था जो उसे तसल्ली देता। वह आँसू बहाती हुई उस सूने डाकघर के चारों ओर चक्कर काटती रही। उसके दिल में अब भी कहीं एक छोटी-सी उम्मीद बाक़ी थी कि शायद उसके बाबू लौट आएँ।
इस कहानी के बारे में
रवींद्रनाथ टैगोर (1861–1941), बांग्ला कवि, लेखक और संगीतकार, 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले पहले ग़ैर-यूरोपीय बने। उन्होंने "पोस्टमास्टर" 1891 में बांग्ला में लिखी थी, ग्रामीण बंगाल में अपने परिवार की जागीरों की देखभाल के दिनों के अनुभवों के आधार पर। यह उसका एक छोटा और सरल किया हुआ पुनर्कथन है।