वह छापाख़ाना जिसने दुनिया बदल दी
लगभग 1450 में, जर्मनी के माइंत्स शहर में, योहानेस गुटेनबर्ग नाम के एक सुनार ने किताबें तेज़ी से छापने का तरीक़ा खोज निकाला। पचास साल के भीतर यूरोप पूरी तरह बदल गया।
- 3 मिनट का पाठ
- Ages 10+
- Historical narrative
- 1400s
ज़रा ऐसी दुनिया की कल्पना कीजिए जहाँ हर किताब हाथ से नक़ल करनी पड़ती हो।
1450 के दशक से पहले यूरोप ऐसा ही था। कोई लिपिक क़लम से एक-एक अक्षर, एक-एक पन्ना करके पूरी किताब लिखता था। बाइबल जैसी लंबी किताब लिखने में एक कुशल लिपिक को एक साल या उससे भी ज़्यादा लग सकता था। किताबें दुर्लभ थीं और महँगी थीं। ज़्यादातर किताबें मठों, विश्वविद्यालयों और बहुत अमीर लोगों के पुस्तकालयों में रखी जाती थीं। ज़्यादातर आम लोगों के पास कभी कोई किताब नहीं होती थी, और वे पढ़ भी नहीं सकते थे।
यह सब बदलने वाला था।
सुनार
योहानेस गुटेनबर्ग का जन्म लगभग 1400 में जर्मनी में राइन नदी के किनारे बसे शहर माइंत्स में हुआ था। उनके शुरुआती जीवन के बारे में पक्के तौर पर बहुत कम पता है। उन्होंने सुनार और धातु-कारीगर का काम सीखा, और धातु को सटीकता से काटना और ढालना सीखा।
1430 के दशक में, जब वे स्ट्रासबर्ग में रहते थे, वे एक गुप्त कारोबारी परियोजना से जुड़े थे। उस समय के एक मुक़दमे के अदालती रिकॉर्ड में एक प्रेस, धातु के टुकड़ों और सीसे का ज़िक्र है, जिससे लगता है कि वे तब भी छपाई के प्रयोग कर रहे थे।
लगभग 1448 तक वे माइंत्स लौट आए थे, और उस विचार पर काम कर रहे थे जिसने उन्हें मशहूर बनाया।
विचार
छपाई अपने आप में कोई नई चीज़ नहीं थी। चीन, कोरिया और दूसरी जगहों पर लोग सदियों से लकड़ी के खुदे हुए ठप्पों से, या मिट्टी, लकड़ी या धातु के अलग-अलग अक्षरों (मूवेबल टाइप) से लिखाई छापते आ रहे थे। कोरिया में 1377 में धातु के अलग-अलग अक्षरों से छपी एक किताब, जिकजी, तैयार हुई थी। यूरोप में लोग लकड़ी के खुदे हुए ठप्पों से तस्वीरें और छोटी-छोटी इबारतें छापते थे।
गुटेनबर्ग ने जो बनाया, वह एक पूरी व्यवस्था थी, जिसने छपाई को इतना तेज़, सटीक और सस्ता बना दिया कि सब कुछ बदल गया।
पहला, उन्होंने धातु से अलग-अलग अक्षर बनाए, हर अक्षर का एक टुकड़ा, जिन्हें जोड़कर शब्द और पंक्तियाँ बनाई जा सकती थीं, और फिर अलग करके दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता था। हज़ारों एक जैसे अक्षर जल्दी बनाने के लिए उन्होंने एक हाथ का साँचा ईजाद किया, जिससे कोई कारीगर पल भर में एक नया अक्षर ढाल सकता था।
दूसरा, उन्होंने एक मिश्र धातु तैयार की, जिसमें ज़्यादातर सीसा, टिन और एंटिमनी थे, जो आसानी से पिघलती थी, जल्दी ठंडी होती थी और इतनी सख़्त थी कि हज़ारों पन्ने छाप सके।
तीसरा, उन्होंने तेल वाली एक स्याही बनाई, जो वार्निश जैसी थी और धातु के अक्षरों पर चिपकी रहती थी। लिपिकों की पानी वाली स्याहियाँ उन पर से बस बह जाती थीं।
और चौथा, उन्होंने पेंच वाले एक प्रेस को, जैसे प्रेस शराब बनाने के लिए अंगूर दबाने में इस्तेमाल होते थे, इस तरह ढाला कि वह स्याही लगे अक्षरों पर काग़ज़ को बराबर दबा सके।
बाइबल
गुटेनबर्ग का सबसे मशहूर काम लैटिन में छपी एक बाइबल थी, जो लगभग 1455 में पूरी हुई।
उसमें लगभग 1,280 पन्ने थे, दो खंडों में, और हर कॉलम में लिखाई की बयालीस पंक्तियाँ थीं। इतिहासकारों का अनुमान है कि उसकी लगभग 180 प्रतियाँ छापी गईं, कुछ काग़ज़ पर और कुछ बछड़े की खाल से बने वेलम पर। हर पन्ना इतनी सावधानी से जमाया गया था और इतनी बराबरी से छापा गया था कि वह हाथ से लिखी सबसे बढ़िया किताबों जितना ही सुंदर दिखता था। बहुत-सी प्रतियों को बाद में हाथ से रंगीन पहले अक्षरों और किनारियों से सजाया गया।
आज उसकी पचास से भी कम प्रतियाँ बची हैं, और उनमें से सिर्फ़ लगभग बीस ही पूरी हैं। वे दुनिया की सबसे क़ीमती किताबों में गिनी जाती हैं।
कारोबार हाथ से निकल गया
लेकिन गुटेनबर्ग अमीर नहीं बने।
अपनी कार्यशाला बनाने में बेहिसाब पैसा लगा था। उन्होंने योहान फ़ुस्ट नाम के एक धनी कारोबारी से बड़ी रक़में उधार ली थीं। 1455 में, लगभग उसी समय जब बाइबल पूरी हुई, फ़ुस्ट अपना पैसा वापस पाने के लिए उन्हें अदालत ले गया। गुटेनबर्ग हार गए। फ़ुस्ट ने ज़्यादातर साज़-सामान अपने क़ब्ज़े में ले लिया और गुटेनबर्ग के एक कुशल कारीगर, पीटर शॉफ़र, के साथ मिलकर कारोबार शुरू कर दिया।
लगता है कि गुटेनबर्ग छोटे पैमाने पर छपाई करते रहे। 1465 में माइंत्स के आर्कबिशप ने उन्हें एक उपाधि दी, और हर साल अनाज, शराब और कपड़ों का भत्ता बाँध दिया। 1468 में उनका निधन हो गया।
उनकी छापी किसी भी किताब पर उनका नाम नहीं है।
क्रांति
यह नया आविष्कार हैरान कर देने वाली रफ़्तार से फैला। माइंत्स में सीखे हुए छापेख़ाने वाले यह हुनर पूरे यूरोप में ले गए। सन 1500 तक दो सौ से ज़्यादा कस्बों और शहरों में छापेख़ाने लग चुके थे, और इतिहासकारों का अनुमान है कि तब तक किताबों की लाखों प्रतियाँ छप चुकी थीं।
किताबें सस्ती हो गईं। ज़्यादा लोग पढ़ना सीखने लगे। वैज्ञानिक अपनी खोजें सही-सही, लिपिकों की नक़ल वाली ग़लतियों के बिना, दूसरों तक पहुँचा सकते थे। नए विचार दशकों के बजाय महीनों में पूरे महाद्वीप में फैल सकते थे। छपाई ने पुनर्जागरण, प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार आंदोलन, वैज्ञानिक क्रांति और, बहुत बाद में, अख़बारों और जन-शिक्षा को मुमकिन बनाने में मदद की।
बहुत-से इतिहासकार इसे मानव इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण आविष्कारों में से एक मानते हैं।
और पढ़ना चाहते हैं?
जॉन मैन की किताब The Gutenberg Revolution गुटेनबर्ग के जीवन और उनके आविष्कार का एक जीवंत ब्योरा है। माइंत्स के गुटेनबर्ग संग्रहालय में उनकी बाइबल की प्रतियाँ रखी हैं, और वहाँ उनके तरीक़ों का प्रदर्शन करके दिखाया जाता है। और हाँ, इस वेबसाइट की अपनी डाउनलोड की जा सकने वाली किताबें भी, दूर के रिश्ते से ही सही, उसी सिलसिले की वंशज हैं जो गुटेनबर्ग ने शुरू किया था।