सबसे शांत स्वर्ण
ओलंपिक खेलों की सौ साल से ज़्यादा की कहानी में किसी भारतीय ने व्यक्तिगत स्वर्ण पदक नहीं जीता था। 2008 में बीजिंग में, राइफ़ल थामे एक नौजवान बिल्कुल स्थिर खड़ा रहा, उसने साँस ली, और यह बदल दिया।
- 4 मिनट की कहानी
- Ages 10+
- Biography
- 1990s–2008
बीजिंग का शूटिंग हॉल लगभग ख़ामोश था। आठ लोग एक कतार में खड़े थे, हर एक के हाथ में भारी राइफ़ल, हर एक की नज़र दस मीटर दूर एक नन्हे-से निशाने पर टिकी हुई। उस निशाने का बीच वाला हिस्सा, जिस पर सबसे ज़्यादा अंक मिलते हैं, लगभग आधे मिलीमीटर का एक बिंदु होता है, इस वाक्य के आख़िर में लगे पूर्ण विराम से भी छोटा।
तारीख़ थी 11 अगस्त 2008, और यह पुरुषों की 10 मीटर एयर राइफ़ल का फ़ाइनल था। उन आठ में से एक थे भारत के पच्चीस साल के अभिनव बिंद्रा। बस एक निशाना बाक़ी था।
घर में एक शूटिंग रेंज
अभिनव का जन्म 1982 में देहरादून में हुआ और वे पंजाब में बड़े हुए। उनका परिवार खाता-पीता था, और वे जो भी काम हाथ में लेते, उनके माता-पिता उनका साथ देते। बचपन में वे कोई ख़ास खिलाड़ी नहीं थे। लेकिन किशोर उम्र की शुरुआत में शूटिंग ने उन्हें अपनी ओर खींच लिया।
उनके पिता, अपजीत बिंद्रा, ने एक अनोखा काम किया। उन्होंने परिवार के घर में ही एक शूटिंग रेंज बनवा दी, ताकि उनका बेटा रोज़ अभ्यास कर सके। अभिनव ने रोज़ अभ्यास किया, घंटों तक। वे एक शांत, गंभीर लड़के थे, जिन्हें एक ही काम बार-बार तब तक करना अच्छा लगता था जब तक वह बिल्कुल सही न हो जाए।
वे तेज़ी से आगे बढ़े। 2000 के सिडनी ओलंपिक में वे सिर्फ़ सत्रह साल के थे, भारतीय दल के सबसे कम उम्र के सदस्य। वे फ़ाइनल तक नहीं पहुँचे, लेकिन उन्होंने ओलंपिक को अंदर से देख लिया था।
स्थिरता का खेल
बाहर से एयर राइफ़ल शूटिंग आसान लगती है। आप खड़े होते हैं, निशाना साधते हैं, ट्रिगर दबाते हैं। लेकिन सबसे ऊँचे स्तर पर लगभग हर निशानेबाज़ बीच में ही मारता है। जो चीज़ उन्हें अलग करती है, वह बहुत छोटी होती है: ग़लत पल पर एक धड़कन, ज़रा-सा तना हुआ कंधा, भटकता हुआ एक ख़याल।
इसलिए असली मुक़ाबला अपने आप से होता है। अभिनव ने अपने शरीर को राइफ़ल किसी मूर्ति की तरह स्थिर थामे रहना सिखाया। उन्होंने अपनी साँस और अपनी धड़कन को साधा। उन्होंने भारत और जर्मनी में कोचों और खेल वैज्ञानिकों के साथ काम किया, और छोटे-छोटे सुधारों की तलाश में लंबे महीने परिवार से दूर, विदेश में बिताए।
2004 के एथेंस ओलंपिक में वे फ़ाइनल तक पहुँचे, लेकिन सातवें स्थान पर रहे। वे टूट गए। उनसे जो कुछ भी हो सकता था, उन्होंने किया था, और वह काफ़ी नहीं निकला।
फिर उनकी पीठ में दर्द रहने लगा। कुछ समय तक चोट इतनी गंभीर थी कि वे अपनी राइफ़ल ठीक से थाम ही नहीं पाते थे। बहुत लोग सोचने लगे कि क्या वे कभी चोटी पर लौट पाएँगे।
वे लौटे। 2006 में ज़ाग्रेब की वर्ल्ड चैंपियनशिप में उन्होंने 10 मीटर एयर राइफ़ल जीती। इससे पहले कोई भारतीय कभी शूटिंग में विश्व चैंपियन नहीं बना था।
बीजिंग
बीजिंग के क्वालिफ़ाइंग राउंड में हर निशानेबाज़ ने साठ निशाने लगाए। अभिनव चौथे स्थान पर रहे, जिससे वे फ़ाइनल में तो पहुँच गए, लेकिन तीन लोगों से पीछे थे।
फ़ाइनल में हर निशानेबाज़ दस और निशाने लगाता है, एक-एक करके, और हर निशाने के अंक दशमलव के एक अंक तक गिने जाते हैं। एक-एक निशाने के साथ अभिनव धीरे-धीरे ऊपर चढ़ते गए। जब दूसरे डगमगाए, वे शांत रहे। जब आख़िरी निशाने की बारी आई, तो वे फ़िनलैंड के हेनरी हक्किनेन के साथ बराबरी पर सबसे ऊपर थे।
हॉल फिर ख़ामोश हो गया। अभिनव ने राइफ़ल उठाई और अपनी मुद्रा में जम गए। उन्होंने धीरे से साँस छोड़ी। फिर गोली चलाई।
स्कोर चमका: 10.8, जो सबसे ऊँचे संभव अंक के बहुत क़रीब था। हक्किनेन का आख़िरी निशाना उतना अच्छा नहीं रहा। अभिनव बिंद्रा ओलंपिक स्वर्ण पदक जीत चुके थे।
एक शांत चैंपियन
वे न उछले, न चिल्लाए। टीवी पर एक नौजवान दिखा जो हल्का-सा मुस्कुराया, उसने हाथ मिलाए और अपनी राइफ़ल नीचे कर ली। बाद में अपनी आत्मकथा में उन्होंने उस पल के बाद एक अजीब-से ख़ालीपन का ज़िक्र किया, जैसे उन्हें समझ ही न आ रहा हो कि अब, जब लंबी दौड़ ख़त्म हो गई है, वे अपने साथ क्या करें।
देश में भारत ख़ुशी से झूम उठा। भारत की हॉकी टीमों ने कई बार ओलंपिक स्वर्ण जीते थे, लेकिन वे टीम के पदक थे। जितने सालों से भारत ओलंपिक खेलों में जा रहा था, उनमें कभी किसी भारतीय ने व्यक्तिगत स्वर्ण नहीं जीता था। अब एक ने जीत लिया था।
बीजिंग के उस हॉल में भारत का राष्ट्रगान बजा, और तिरंगा ऊपर उठा। देश में करोड़ों लोग, जिन्होंने शूटिंग के बारे में कभी ज़्यादा नहीं सोचा था, उसे बार-बार देखते रहे।
स्वर्ण के बाद
अभिनव बिंद्रा आठ साल और मुक़ाबलों में उतरते रहे। 2016 के रियो ओलंपिक में, जो उनके आख़िरी खेल थे, वे चौथे स्थान पर आए और बहुत ही मामूली अंतर से पदक से चूक गए। उसके कुछ ही समय बाद उन्होंने संन्यास ले लिया।
तब से वे खेल विज्ञान, कोचिंग और खिलाड़ियों के शरीर और मन की बेहतर देखभाल के ज़रिए भारत के युवा खिलाड़ियों की मदद करने में लगे हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति की समितियों में भी काम किया है, और दुनिया भर के खिलाड़ियों के हक़ में आवाज़ उठाई है।
बीजिंग का उनका स्वर्ण रफ़्तार या ताक़त से नहीं आया था। वह बरसों तक स्थिर खड़े रहने, धीरे-धीरे साँस लेने, और एक छोटी, सधी हुई हरकत को उतनी अच्छी तरह करने से आया था जितनी अच्छी तरह कोई इंसान कर सकता है।
और पढ़ना चाहते हैं?
अभिनव बिंद्रा ने खेल लेखक रोहित बृजनाथ के साथ मिलकर लिखी किताब A Shot at History में अपनी कहानी ईमानदारी और हल्के-फुल्के अंदाज़ में ख़ुद सुनाई है। उनके नतीजे अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति की आधिकारिक साइट Olympics.com पर दर्ज हैं।