वह दौड़ जो उन्होंने नहीं दौड़ी
एरिक लिडेल दुनिया के सबसे तेज़ धावकों में से एक थे, और 1924 के ओलंपिक में उनकी सबसे अच्छी दौड़ रविवार को होनी थी। उन्होंने चुपचाप एक फ़ैसला किया, और फिर एक दूसरा रास्ता ढूँढ़ लिया।
- 5 मिनट की कहानी
- Ages 10+
- Biography
- 1902–1945
ध्यान दें: इस कहानी में दूसरे विश्व युद्ध के एक बंदी शिविर का, और वहाँ बीमारी से कहानी के नायक की मौत का ज़िक्र है। इसे नरमी से, बिना ब्योरे के सुनाया गया है।
1924 में जुलाई का एक दिन था, पेरिस में। ओलंपिक खेलों में 400 मीटर के फ़ाइनल के लिए छह धावक कतार में खड़े थे। उनमें से एक, एरिक लिडेल नाम का एक स्कॉटिश युवक, असल में 400 मीटर के धावक थे ही नहीं। वे स्प्रिंटर थे, और जिस दौड़ की उन्होंने तैयारी की थी, 100 मीटर, वह उनके बिना ही हो चुकी थी।
उन्होंने वह दौड़ जान-बूझकर छोड़ी थी। वजह सीधी-सी थी। उसकी कुछ दौड़ें रविवार को थीं।
चीन से आया एक लड़का
एरिक लिडेल का जन्म 1902 में उत्तरी चीन के थ्येनजिन शहर में हुआ था, जहाँ उनके स्कॉटिश माता-पिता ईसाई मिशनरी के रूप में काम करते थे। जब वे पाँच साल के थे, तो उन्हें और उनके बड़े भाई रॉब को लंदन के एक बोर्डिंग स्कूल भेज दिया गया, जो मिशनरियों के बेटों के लिए था। दोनों भाई कई-कई साल तक अपने माता-पिता से नहीं मिल पाते थे।
एरिक शर्मीले और सीधे-सादे थे, लेकिन खेल के मैदान पर उनमें जान आ जाती थी। वे तेज़ थे, हैरान कर देने वाली हद तक तेज़। एडिनबरा यूनिवर्सिटी में, जहाँ वे विज्ञान पढ़ते थे, वे ब्रिटेन के सबसे अच्छे स्प्रिंटरों में गिने जाने लगे। वे स्कॉटलैंड के लिए विंग पर रग्बी भी खेलते थे।
उनके दौड़ने का अंदाज़ अजीब था। सिर पीछे की ओर झुक जाता, बाँहें हवा में इधर-उधर घूमतीं और ठुड्डी आसमान की तरफ़ उठ जाती। लोग उनके अंदाज़ पर हँसते थे। फिर उन्हें जीतते हुए देखते थे।
1923 में उन्होंने 100 गज़ 9.7 सेकंड में दौड़कर ब्रिटिश रिकॉर्ड बनाया, जो कई सालों तक टिका रहा। सबको उम्मीद थी कि अगली गर्मियों में पेरिस ओलंपिक की 100 मीटर दौड़ में वे ब्रिटेन की सबसे बड़ी उम्मीद होंगे।
कार्यक्रम
फिर खेलों का कार्यक्रम आया। 100 मीटर की हीट रविवार को होनी थीं।
एरिक के लिए रविवार आराम और इबादत का दिन था, ईश्वर के लिए अलग रखा गया दिन। उनकी परवरिश इसी तरह हुई थी और वे इसमें गहराई से यक़ीन करते थे। वे नहीं दौड़ेंगे।
यह फ़ैसला खेलों से बहुत पहले सबको पता चल गया। कुछ अख़बार और अधिकारी नाराज़ हुए, और कुछ आलोचकों ने कहा कि वे अपने देश को निराश कर रहे हैं। उन्होंने बहस नहीं की, न इस पर भाषण दिए। उन्होंने बस इतना कहा कि वे उस दिन नहीं दौड़ेंगे, और अपना इरादा नहीं बदला।
इसके बजाय उन्होंने और उनके कोच ने कार्यक्रम को दोबारा देखा। वे 200 मीटर और 400 मीटर दौड़ सकते थे, जिनमें से किसी की भी दौड़ रविवार को नहीं थी। 400 मीटर बिल्कुल अलग तरह की दौड़ थी, जिसमें रफ़्तार के साथ-साथ दम भी चाहिए। उसे सीखने के लिए उनके पास कुछ महीने थे।
पेरिस
100 मीटर की हीट वाले रविवार को एरिक लिडेल स्टेडियम में नहीं थे। वे चर्च गए। 100 मीटर की दौड़ उनके ब्रिटिश साथी हैरल्ड एब्रहम्स ने जीती।
कुछ दिन बाद एरिक ने 200 मीटर में काँस्य पदक जीता। यह अच्छा नतीजा था, लेकिन 400 मीटर अभी बाक़ी थी, और बहुत कम लोगों को उम्मीद थी कि वे उसे जीतेंगे। अमेरिकियों के पास मज़बूत धावक थे, और उस दूरी पर एरिक अभी नए थे।
फ़ाइनल से पहले ब्रिटिश टीम के किसी सदस्य ने उनके हाथ में काग़ज़ का एक छोटा-सा टुकड़ा थमा दिया। उस पर बाइबल की, सैमुअल की पहली किताब की, एक पंक्ति लिखी थी: "जो मेरा आदर करते हैं, मैं उनका आदर करूँगा।" एरिक का मन भर आया, और वे वह पर्ची अपने साथ स्टार्ट तक ले गए।
बंदूक़ चलते ही वे ऐसी रफ़्तार से निकले जो लापरवाही लगती थी, जैसे यह कोई स्प्रिंट हो। दर्शकों को लगा कि आख़िरी मोड़ पर वे थक जाएँगे। ऐसा नहीं हुआ। सिर पीछे, बाँहें चलती हुईं, वे पूरे रास्ते डटे रहे, और बाक़ियों से काफ़ी आगे लाइन पार की।
उनका समय, 47.6 सेकंड, एक नया विश्व रिकॉर्ड था। जिन अख़बारों ने उनकी आलोचना की थी, उन्होंने अब उन्हें हीरो कहकर सराहा।
वापस चीन
एरिक लिडेल एक मशहूर खिलाड़ी बनकर ब्रिटेन में रह सकते थे। इसके बजाय, ओलंपिक के अगले साल वे थ्येनजिन के एक कॉलेज में पढ़ाने के लिए चीन लौट गए, जैसे उनसे पहले उनके माता-पिता ने वहाँ सेवा की थी। वे विज्ञान पढ़ाते, छात्रों के लिए खेल करवाते, और चर्च में काम करते थे।
1934 में उन्होंने कनाडाई मिशनरियों की बेटी फ़्लोरेंस मैकेंज़ी से शादी की, और उनकी दो बेटियाँ हुईं। तब तक चीन एक ख़तरनाक जगह बन चुका था, जापान के साथ युद्ध से बिखरा हुआ। 1941 में, जब ख़तरा बढ़ा, तो फ़्लोरेंस और बच्चियाँ कनाडा चली गईं, जहाँ उनकी तीसरी बेटी का जन्म हुआ। एरिक अपना काम जारी रखने के लिए पीछे रुक गए। वे अपनी सबसे छोटी बेटी से कभी नहीं मिल पाए।
शिविर
1943 में जापानी सेना एरिक और उस इलाक़े के कई दूसरे विदेशियों को वेइश्येन के एक बंदी शिविर में ले गई। वहाँ लगभग 1,800 लोग ठुँसे हुए थे, खाना कम था और रहने की जगह ख़राब।
जो लोग वहाँ थे, वे सालों बाद तक उन्हें याद करते रहे। वे जो कुछ भी मिल जाता, उसी से बच्चों को विज्ञान पढ़ाते। वे खेल और दौड़ें करवाते, ताकि नौजवानों के पास किसी चीज़ का इंतज़ार रहे। वे बुज़ुर्गों और बीमारों की देखभाल करते, और दूसरों के लिए पानी और कोयला ढोते। लोग कहते थे कि उन्होंने कभी उन्हें किसी के बारे में बुरा बोलते नहीं सुना।
बच्चे उन्हें अंकल एरिक कहते थे। उनमें से बहुतों ने बाद में कहा कि वे उनकी जान-पहचान के सबसे दयालु इंसान थे।
1945 की शुरुआत में वे बहुत बीमार पड़ गए। उसी साल फ़रवरी में, दिमाग़ के ट्यूमर से, तैंतालीस साल की उम्र में शिविर में ही उनका निधन हो गया। शिविर कुछ ही महीनों बाद आज़ाद हुआ।
कहानी ज़िंदा है
1981 में एक फ़िल्म, Chariots of Fire, ने पेरिस ओलंपिक की कहानी सुनाई, और दुनिया को वह धावक याद आया जो रविवार को नहीं दौड़ा था। फ़िल्म में कुछ बातें नाटकीयता के लिए बदली गई थीं, लेकिन उसका दिल सच्चा था।
एरिक लिडेल को स्कॉटलैंड में और चीन में याद किया जाता है, जहाँ पुराने शिविर की जगह पर उनका एक स्मारक खड़ा है। लोग उन्हें उनके स्वर्ण पदक के लिए याद करते हैं। लेकिन जो लोग उन्हें सबसे अच्छी तरह जानते थे, वे उन्हें उनकी नरमी के लिए, और जिस बात पर वे यक़ीन करते थे उस पर चुपचाप टिके रहने के उनके ढंग के लिए ज़्यादा याद करते थे।
और पढ़ना चाहते हैं?
सैली मैग्नसन की The Flying Scotsman और डंकन हैमिल्टन की For the Glory, दोनों किताबें एरिक लिडेल की पूरी ज़िंदगी बताती हैं, चीन और शिविर में बिताए उनके सालों समेत। उनके ओलंपिक नतीजे Olympics.com पर हैं।