वह राइस कुकर जो नाकाम रहा
युद्ध के बाद टोक्यो के खंडहरों में, कुछ इंजीनियर एक जले हुए डिपार्टमेंट स्टोर में रेडियो ठीक करते थे और एक बिजली वाला राइस कुकर बनाने की कोशिश कर रहे थे। वह नहीं चला। उसके बाद उन्होंने जो किया, वही सोनी बना।
- 4 मिनट की कहानी
- Ages 11+
- True story
- 1945–1950s
ध्यान दें: इस कहानी में दूसरे विश्व युद्ध में टोक्यो पर हुई बमबारी का ज़िक्र है।
चावल लकड़ी के एक टब में डाले जाते। टब की तली में एल्युमिनियम की दो पट्टियाँ लगी थीं, जो बिजली के तारों से जुड़ी थीं। करंट चालू करने पर वह गीले चावल और पानी में से गुज़रता और उन्हें गरम करता।
तरकीब होशियारी की थी। जैसे-जैसे पानी उबलकर उड़ता, करंट अपने आप रुक जाता, और चावल पक जाते।
असल में ऐसा लगभग कभी नहीं हुआ। चावल और पानी के हिसाब से वे या तो अधकच्चे निकलते या गीले और लिजलिजे। इसे बनाने वाले इंजीनियर, एक उजड़े शहर के बीचों-बीच, एक टूटे-फूटे डिपार्टमेंट स्टोर में, बार-बार कोशिश करते रहे। राइस कुकर कभी बिकने लायक़ चीज़ नहीं बन पाया।
राख में डूबा एक शहर
1945 की शरद ऋतु थी। दूसरा विश्व युद्ध अभी-अभी ख़त्म हुआ था। टोक्यो का बड़ा हिस्सा बमबारी और आग में तबाह हो चुका था। खाना कम था, घर उजड़ चुके थे, और लाखों लोग यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि अब जिएँ कैसे।
मासारू इबुका लगभग चालीस बरस के एक इंजीनियर थे। युद्ध के दौरान वे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने वाली एक कंपनी चलाते थे। अब वे अपने साथ काम कर चुके मुट्ठी भर लोगों के साथ टोक्यो लौटे और निहोनबाशी के शिरोकिया डिपार्टमेंट स्टोर में एक छोटी-सी जगह किराए पर ली। वह इमारत ख़ुद भी हवाई हमलों में टूट-फूट चुकी थी।
उन्होंने उसे नाम दिया टोक्यो टेलीकम्युनिकेशंस रिसर्च इंस्टिट्यूट। नाम कमरे से कहीं बड़ा था।
रेडियो और चावल
उन्हें जो भी काम मिलता, वे करते। युद्ध के दौरान जापान के बहुत-से रेडियो इस तरह बदल दिए गए थे कि वे विदेश से आने वाले शॉर्टवेव प्रसारण न पकड़ सकें। इबुका की टीम रेडियो ठीक करती और छोटे-छोटे अडैप्टर बनाती, ताकि लोग बाहर की दुनिया को फिर से सुन सकें।
उन्होंने ऐसी चीज़ें ईजाद करने की भी कोशिश की जिनकी एक भूखे, टूटे शहर को ज़रूरत हो सकती थी, और बिजली वाला राइस कुकर उनमें से एक था। वह नाकाम रहा। शुरू के कुछ और विचार भी नाकाम रहे। लेकिन रेडियो का काम अच्छा था, और लोगों तक उसकी बात पहुँची।
एक अख़बार के कॉलम में डिपार्टमेंट स्टोर की उस छोटी-सी वर्कशॉप का ज़िक्र हुआ। अकियो मोरिता नाम के एक नौजवान ने उसे पढ़ा।
दो साझेदार
मोरिता और इबुका युद्ध के दौरान मिले थे, जब दोनों नौसेना की एक रिसर्च कमेटी में काम करते थे। मोरिता उम्र में काफ़ी छोटे थे, कोई पच्चीस-छब्बीस साल के, तेज़ दिमाग़ वाले एक भौतिकशास्त्री, जिन्हें लोगों से बात करने का हुनर था। इबुका आविष्कारक थे, जो वर्कबेंच पर सबसे ख़ुश रहते थे।
मोरिता ने इबुका को चिट्ठी लिखी और फिर उनसे मिलने गए। दोनों ने मिलकर एक कंपनी बनाने का फ़ैसला किया।
एक अड़चन थी। मोरिता एक ऐसे परिवार के सबसे बड़े बेटे थे जो कई पीढ़ियों से नागोया के पास साके बनाता आया था। उनसे उम्मीद थी कि वे परिवार का कारोबार सँभालेंगे। वे घर गए और इबुका को साथ लेकर अपने पिता से बात की। उनके पिता ने उन्हें जाने की इजाज़त दे दी, और बाद में नई कंपनी की पैसों से मदद भी की।
7 मई 1946 को उन्होंने टोक्यो त्सुशिन कोग्यो, यानी टोक्यो टेलीकम्युनिकेशंस इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन, की स्थापना की। उसमें लगभग बीस लोग थे और बहुत थोड़ा पैसा। इबुका ने एक स्थापना-पत्र लिखा, जिसमें उस कंपनी का ख़ाका था जिसकी वे उम्मीद करते थे: एक आज़ाद और खुली जगह, जहाँ इंजीनियर अपने काम का आनंद ले सकें और ऐसी चीज़ें बना सकें जो आम लोगों के काम आएँ।
टपकती छत
कंपनी जल्द ही शिनागावा में एक पहाड़ी पर बनी लकड़ी की एक पुरानी इमारत में चली गई। अपने संस्मरण में मोरिता ने याद किया है कि छत इतनी बुरी तरह टपकती थी कि बारिश में लोग कभी-कभी छाते तानकर काम करते थे।
उनका पहला बड़ा उत्पाद एक टेप रिकॉर्डर था, जो 1950 में तैयार हुआ। वह काम करता था, लेकिन बहुत बड़ा, भारी और महँगा था, और शुरू में लगभग कोई उसे ख़रीदना नहीं चाहता था। लोगों को पता ही नहीं था कि वे उसका क्या करेंगे। साझेदारों ने एक कड़वा सबक़ सीखा: किसी चीज़ का आविष्कार करना आधा ही काम था। उन्हें यह भी समझना था कि उसकी ज़रूरत किसे है, और क्यों।
उन्होंने छोटी और सस्ती मशीनें बनाईं। उन्हें स्कूलों में ग्राहक मिले, जो रिकॉर्डरों से पढ़ाने का काम लेते थे। धीरे-धीरे कंपनी के पैर जमने लगे।
छोटा-सा रेडियो
1950 के दशक की शुरुआत में अमेरिकी कंपनी वेस्टर्न इलेक्ट्रिक एक नए आविष्कार, ट्रांज़िस्टर, के लाइसेंस दे रही थी, जो रेडियो के बड़े, गरम वाल्वों की जगह ले सकता था। कम ही लोगों को यक़ीन था कि यह आम चीज़ों में इस्तेमाल के लिए तैयार है। इबुका को यक़ीन था। कंपनी ने लाइसेंस ख़रीदा और ट्रांज़िस्टर को इतना अच्छा बनाने में बरसों लगाए कि उसे बड़ी तादाद में बनाया जा सके।
1955 में उन्होंने अपना पहला ट्रांज़िस्टर रेडियो निकाला। उसके बाद एक और छोटा रेडियो आया। उन्होंने एक नया नाम चुना, जिसे दुनिया में कहीं भी आसानी से बोला जा सके: सोनी। 1958 में कंपनी ने ख़ुद भी यही नाम अपना लिया।
इबुका और मोरिता ज़िंदगी भर कंधे से कंधा मिलाकर काम करते रहे। इबुका का निधन 1997 में हुआ, मोरिता का 1999 में। तब तक सोनी को धरती का लगभग हर देश जानता था।
इसकी शुरुआत रेडियो की मरम्मत, कुछ अडैप्टरों और एक ऐसे राइस कुकर से हुई थी जो कभी इतना अच्छा नहीं चला कि बिक सके।
और पढ़ना चाहते हैं?
अकियो मोरिता का संस्मरण Made in Japan कंपनी के शुरुआती बरसों की कहानी उनके अपने शब्दों में सुनाता है। जॉन नेथन की Sony: The Private Life एक ज़्यादा विस्तृत इतिहास है। सोनी की वेबसाइट पर उसकी शुरुआत का विस्तार से ब्योरा है, राइस कुकर समेत।