नमक का दारोगा
एक नौजवान नमक विभाग में नौकरी पाता है, जहाँ सब जानते हैं कि असली कमाई रिश्वत से होती है। एक रात ज़िले का सबसे अमीर आदमी नमक की तस्करी करते पकड़ा जाता है, और आँखें मूँद लेने के बदले उसे एक दौलत पेश करता है। प्रेमचंद की क्लासिक कहानी, "नमक का दारोगा"।
- 4 मिनट की कहानी
- Ages 12+
- Classic retold
- 1910s
रात अँधेरी और ठंडी थी, और पुल के नीचे नदी उफान पर थी। सड़क पर कहीं गाड़ियों की एक लंबी क़तार चरमराती हुई धीरे-धीरे पुल की ओर बढ़ रही थी।
आवाज़ सुनकर नौजवान दारोगा की नींद खुल गई। आधी रात को नदी पार माल कौन ले जा रहा होगा? उसने अपना कोट पहना और बाहर निकल आया।
पिता की सीख
उसका नाम वंशीधर था। वह एक ऐसे परिवार से था जो कभी खाता-पीता था और अब बहुत ग़रीब हो चुका था। जब वह काम की तलाश में निकला, तो उसके बूढ़े पिता ने उसे कुछ सलाह दी।
तनख़्वाह पर मत जाना, पिता ने कहा। तनख़्वाह पूरनमासी के चाँद जैसी है: महीने में एक बार दिखती है, और फिर धीरे-धीरे घटती जाती है। ऐसी जगह देखना जहाँ ऊपरी आमदनी हो, वह जो बहते सोते की तरह हर दिन आती है। लोग अपनी ज़रूरत लेकर तुम्हारे पास आएँगे। चतुर बनना, और जो वे दें, ले लेना।
वंशीधर ने आदर से सुना। फिर वह दुनिया में निकल पड़ा।
नमक विभाग
उन दिनों सरकार ने नमक के व्यापार पर कड़ा नियंत्रण कर रखा था। एक नया विभाग बनाया गया था ताकि लोग बिना कर चुकाए नमक न ढो सकें, न बेच सकें। तस्करी आम थी, और रिश्वत भी। नमक विभाग का एक दारोगा बहुत जल्दी अमीर बन सकता था, अगर वह आँखें फेर लेने को तैयार हो।
वंशीधर को ठीक ऐसी ही जगह मिली। उसके पिता फूले न समाए। पड़ोसी जलने लगे।
पर वंशीधर के अपने विचार थे। वह ईमानदारी से अपना काम करता था, और किसी से कुछ नहीं लेता था।
पुल पर गाड़ियाँ
अब, इस ठंडी रात में, वह पुल पर गया और पहली गाड़ी रोकी। उस पर बोरे लदे थे। उसने एक में हाथ डाला। नमक।
उसे पता चला कि गाड़ियाँ पंडित अलोपीदीन की थीं, ज़िले के सबसे अमीर और ताक़तवर ज़मींदार। आधा इलाक़ा उनका क़र्ज़दार था। अफ़सर उनके दस्तरख़ान पर खाना खाते थे। सब कहते थे कि ऐसा कुछ नहीं जो उनका पैसा न कर सके।
जल्द ही पंडित अलोपीदीन ख़ुद आ पहुँचे, शांत और मुस्कुराते हुए, मानो यह दो दोस्तों के बीच की कोई छोटी-सी ग़लतफ़हमी हो।
एक ईमानदार आदमी की क़ीमत
उन्होंने विनम्रता से शुरुआत की। उन्हें उम्मीद थी कि दारोगा जी चंद गाड़ियों के लिए ख़ुद को परेशान नहीं करेंगे। फिर उन्होंने एक हज़ार रुपये की पेशकश की।
वंशीधर ने इनकार कर दिया, और अपने सिपाहियों से उन्हें गिरफ़्तार करने को कहा।
अलोपीदीन को कोई चिंता नहीं हुई। उन्होंने पाँच हज़ार की पेशकश की। फिर दस। फिर पंद्रह, फिर बीस। हर बार जब वंशीधर मना करता, पंडित जी रक़म बढ़ा देते, इस यक़ीन के साथ कि अगली रक़म काफ़ी होगी।
आख़िरकार उन्होंने चालीस हज़ार रुपये की पेशकश की। यह इतना पैसा था जितना वंशीधर का पूरा परिवार ज़िंदगी भर में न कमा पाता।
वंशीधर एक पल के लिए भी नहीं हिचकिचाया। उसने फिर इनकार किया और पंडित जी को हिरासत में ले लिया।
ज़िंदगी में पहली बार पंडित अलोपीदीन को गिरफ़्तार करके ले जाया गया।
अदालत
सुबह होते-होते पूरे ज़िले में इसी की चर्चा थी। जो लोग रोज़ रिश्वत लेते थे, वे हैरान थे कि इतने बड़े आदमी के साथ चोर जैसा बर्ताव किया गया।
पर अदालत में अलोपीदीन के पैसे ने अपना काम किया। वकील उनके थे। गवाह डगमगा गए। अफ़सर उनके दोस्त थे। उन्हें बरी कर दिया गया, और मजिस्ट्रेट ने यहाँ तक कहा कि नौजवान दारोगा ने उतावलेपन से, बिना सूझ-बूझ के काम किया था।
एक हफ़्ते के भीतर वंशीधर को नौकरी से निकाल दिया गया।
वह ख़ाली हाथ घर लौटा। उसके पिता ग़ुस्से और कड़वाहट से भरे थे। इतनी पढ़ाई-लिखाई, उन्होंने कहा, और बेटे ने मुफ़्त में एक दौलत ठुकरा दी। उसकी माँ का दिल टूट गया। वंशीधर चुपचाप सुनता रहा।
मेहमान
लगभग एक हफ़्ते बाद, जब शाम ढल रही थी, एक शानदार गाड़ी वंशीधर के घर के बाहर रुकी। उसमें से पंडित अलोपीदीन उतरे।
वंशीधर के पिता दौड़कर बाहर आए, झुक-झुककर माफ़ी माँगने लगे, और मेहमान के सामने अपने बेटे को डाँटने लगे। पर अलोपीदीन ने उन्हें रोक दिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने ज़िंदगी में बहुत से अफ़सर देखे हैं, और हर एक को ख़रीदा है। यह पहला आदमी था जिससे वे मिले और जिसे वे ख़रीद नहीं सके।
फिर उन्होंने एक काग़ज़ निकाला और वंशीधर को थमा दिया।
वह एक पत्र था जिसमें उसे अलोपीदीन की सारी जायदाद का स्थायी मैनेजर नियुक्त किया गया था, अच्छी-ख़ासी तनख़्वाह और उनके सारे कामकाज पर पूरे अधिकार के साथ।
वंशीधर की आँखें भर आईं। उसने कहा कि वह ऐसे पद के लिए काफ़ी पढ़ा-लिखा या अनुभवी नहीं है।
अलोपीदीन मुस्कुराए। उन्होंने कहा कि उन्हें पढ़े-लिखे आदमी की ज़रूरत नहीं है। ऐसे तो उनके पास बहुत हैं। उन्हें ज़रूरत थी एक ईमानदार आदमी की, एक ऐसे आदमी की जो नदी किनारे एक ठंडी रात में चालीस हज़ार रुपये को ना कह दे।
वंशीधर ने क़लम उठाई, और दस्तख़त कर दिए।
इस कहानी के बारे में
प्रेमचंद (1880–1936) हिंदी और उर्दू कथा-साहित्य के सबसे बड़े लेखकों में से एक हैं। "नमक का दारोगा" उस दौर की कहानी है जब भारत में नमक पर भारी कर लगा सरकारी एकाधिकार था, और यह आज भी भारतीय स्कूलों में सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली कहानियों में से एक है। यह संस्करण हिंदी मूल का हमारा अपना छोटा और सरल किया गया अंग्रेज़ी पुनर्कथन है।