← Back to stories

History

मुट्ठी भर नमक

1930 में महात्मा गांधी 385 किलोमीटर पैदल चलकर समुद्र तक जाने को निकले, ताकि नमक उठाकर एक अन्यायपूर्ण क़ानून तोड़ सकें। पूरी दुनिया देखती रह गई।

  • 4 मिनट का पाठ
  • Ages 10+
  • Historical narrative
  • 1930s

ध्यान दें: इस कहानी में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की हिंसा का ज़िक्र है।

इस भाषा में पढ़ें

नमक दुनिया की सबसे मामूली चीज़ों में से एक है। हर किसी को इसकी ज़रूरत होती है। भारत जैसे गर्म देश में, जहाँ लोग धूप में काम करते हैं और पसीना बहाते हैं, यह जीने के लिए ज़रूरी है।

1930 में भारत पर ब्रिटेन का राज था। और ब्रिटिश क़ानून के तहत भारतीयों को अपना नमक ख़ुद इकट्ठा करने या बेचने की इजाज़त नहीं थी। उन्हें नमक ख़रीदना पड़ता था, और हर पुड़िया पर एक कर लगता था, जो ब्रिटिश सरकार के ख़ज़ाने में जाता था। सबसे ग़रीब परिवार को भी, जो और कुछ भी मुश्किल से ख़रीद पाता था, यह कर भरना पड़ता था।

मोहनदास करमचंद गांधी, जिन्हें करोड़ों लोग महात्मा, यानी "महान आत्मा", के नाम से जानते थे, ने तय किया कि नमक भारत के आज़ादी के संघर्ष का प्रतीक बनेगा।

सत्याग्रह

गांधी विरोध के एक तरीक़े में विश्वास रखते थे, जिसे वे सत्याग्रह कहते थे। अंग्रेज़ी में इसका अनुवाद अक्सर "सत्य की शक्ति" या "आत्मा की शक्ति" किया जाता है। इसे मानने वाले अन्यायपूर्ण क़ानूनों को खुलेआम और शांति से तोड़ते, और बिना पलटवार किए सज़ा स्वीकार करते। हिंसा से इनकार करके वे क़ानून के अन्याय को सामने लाना और अपने विरोधियों का दिल जीतना चाहते थे।

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के कुछ दूसरे नेताओं को नमक एक अजीब चुनाव लगा। किसी बड़ी बात पर विरोध क्यों नहीं? लेकिन गांधी समझते थे कि नमक हर भारतीय को छूता है, अमीर हो या ग़रीब, हिंदू हो या मुसलमान, हर गाँव में। नमक को लेकर किया गया विरोध कोई भी समझ सकता था। और कोई भी उसमें शामिल हो सकता था।

शुरुआत करने से पहले उन्होंने भारत के ब्रिटिश शासक, वायसराय लॉर्ड इरविन, को एक चिट्ठी लिखी, जिसमें बताया कि वे क्या करने जा रहे हैं, और माँग की कि नमक पर लगा कर हटा दिया जाए। वायसराय नहीं माने।

यात्रा

12 मार्च 1930 की सुबह गांधी गुजरात में अहमदाबाद शहर के पास स्थित अपने साबरमती आश्रम से पैदल निकल पड़े। वे साठ साल के थे। उनके साथ ध्यान से चुने गए अठहत्तर साथी थे, जो अलग-अलग इलाक़ों और धर्मों से आए थे।

उनकी मंज़िल थी दांडी, अरब सागर के किनारे बसा एक गाँव, जो लगभग 385 किलोमीटर दूर था।

वे चौबीस दिन तक चले, और रोज़ लगभग पंद्रह से बीस किलोमीटर का रास्ता तय करते रहे। गांधी के हाथ में बाँस की एक लाठी रहती थी। हर गाँव में वे रुककर लोगों से बात करते, उन्हें नमक कर के बारे में बताते, साफ़-सफ़ाई और मेहनत की गरिमा के बारे में बताते, और उनसे आज़ादी के आंदोलन से जुड़ने को कहते।

जैसे-जैसे वे आगे बढ़े, भीड़ बढ़ती गई। हज़ारों लोग सड़कों के किनारे क़तार लगाकर खड़े रहते। गाँवों के अधिकारियों ने अपने सरकारी पदों से इस्तीफ़ा दे दिया। भारत और दुनिया भर के पत्रकार इस यात्रा के साथ-साथ चले, और विदेशों के सिनेमाघरों में न्यूज़रील में इसे दिखाया गया।

समुद्र के किनारे

यात्री 5 अप्रैल 1930 को दांडी पहुँचे। अगली सुबह तड़के, प्रार्थना के बाद, गांधी चलकर समुद्र तट तक गए। वहाँ उन्होंने झुककर तट से कीचड़ मिला प्राकृतिक नमक का एक ढेला उठा लिया।

उस छोटी-सी मुट्ठी भर नमक के साथ उन्होंने क़ानून तोड़ दिया था।

यह बहुत छोटा-सा काम था। लेकिन पूरे भारत में करोड़ों लोगों ने उनकी मिसाल पर चलना शुरू कर दिया। समुद्र तटों पर उन्होंने समुद्र के पानी से नमक बनाया। उन्होंने उसे सड़कों पर खुलेआम बेचा। उन्होंने ब्रिटिश कपड़े और ब्रिटिश सामान का बहिष्कार किया।

जवाब

ब्रिटिश अधिकारियों ने दसियों हज़ार लोगों को गिरफ़्तार किया। ख़ुद गांधी को मई 1930 में आधी रात को गिरफ़्तार कर लिया गया।

कुछ हफ़्ते बाद गुजरात के धरासणा नमक कारख़ाने पर, गांधी की गिरफ़्तारी के बाद कवयित्री सरोजिनी नायडू की अगुवाई में, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी क़तारों में नमक कारख़ाने की ओर बढ़े। पुलिस ने उन्हें स्टील की नोक वाली लाठियों से पीटा। क़तार के बाद क़तार, प्रदर्शनकारी अपने बचाव में हाथ उठाए बिना आगे बढ़ते रहे, और क़तार के बाद क़तार, उन्हें मार-मारकर गिरा दिया गया।

एक अमेरिकी पत्रकार, वेब मिलर, वहाँ मौजूद थे। उन्होंने जो देखा, उसकी उनकी रिपोर्ट दुनिया भर के अख़बारों में छपी, और उसने बहुत-से पाठकों को झकझोर दिया। उसकी वजह से भारत से बहुत दूर के लोग भी सवाल करने लगे कि क्या ब्रिटिश राज न्यायपूर्ण है।

साल के आख़िर तक साठ हज़ार से ज़्यादा भारतीय जेल में डाले जा चुके थे।

इससे क्या हासिल हुआ

नमक यात्रा से ब्रिटिश राज ख़त्म नहीं हुआ। नमक कर भी तुरंत नहीं हटाया गया। 1931 में गांधी और लॉर्ड इरविन के बीच एक समझौता हुआ, गांधी–इरविन समझौता, जिसके तहत क़ैदियों को रिहा किया गया और तट पर रहने वाले लोगों को अपने इस्तेमाल के लिए नमक बनाने की इजाज़त मिली। इसके बाद गांधी भारत के भविष्य पर बातचीत के लिए लंदन गए।

कई और बरसों के संघर्ष के बाद आख़िरकार 1947 में भारत को आज़ादी मिली।

लेकिन नमक यात्रा ने सब कुछ बदल दिया। इसने दिखा दिया कि एक शांतिपूर्ण आंदोलन करोड़ों लोगों को एकजुट कर सकता है और पूरी दुनिया का ध्यान खींच सकता है। इसने दूसरे देशों में न्याय और नागरिक अधिकारों के लिए आगे चले अभियानों को प्रेरित किया, जिनमें अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग जूनियर के नेतृत्व वाला आंदोलन भी शामिल है।

आज दांडी में इस यात्रा का एक स्मारक है, जिसमें गांधी और उनके साथी यात्रियों की समुद्र की ओर चलती हुई मूर्तियाँ हैं।

और पढ़ना चाहते हैं?

रामचंद्र गुहा की किताब Gandhi: The Years That Changed the World एक विस्तृत और पढ़ने में आसान जीवनी है, जिसमें नमक यात्रा का पूरा ब्योरा है। थॉमस वेबर की किताब On the Salt March इस यात्रा के रास्ते को दिन-ब-दिन बयान करती है।

Want to read more?

This story is told briefly. For the full, detailed account, these books and records go deeper:

  1. Ramachandra Guha, Gandhi: The Years That Changed the World, 1914–1948. Allen Lane, 2018.
  2. Thomas Weber, On the Salt March: The Historiography of Gandhi's March to Dandi. HarperCollins India, 1997.
  3. National Salt Satyagraha Memorial, Dandi. Ministry of Culture, Government of India.

About this story

This is a translation of the original English story. It was prepared with AI assistance and is awaiting review by a native speaker.

This story is awaiting final editorial fact-checking. If you spot an error, please let us know.

Shared on 1Kahani for reading and awareness. All credit for the research belongs to the authors and records listed under "Want to read more?". Based on published histories; no quotations have been invented. Figures are as commonly given by historians.

Have a copyright concern about this story? Tell us.

Download for Kindle & e-readers

Read next

HistoryHistorical narrative

The King Who Chose Peace

More than two thousand years ago, the most powerful ruler in India won a terrible war, and then did something almost no conqueror has ever done. He had his sorrow carved into stone for everyone to read.

4 min readAges 10+3rd century BCE
HistoryHistorical narrative

The Night the Wall Opened

For 28 years, a wall divided Berlin. On 9 November 1989, a confused answer at a press conference sent thousands of people to the border, and history changed overnight.

4 min readAges 12+1980s
HistoryHistorical narrative

The Seat on the Bus

On 1 December 1955, in Montgomery, Alabama, Rosa Parks refused to give up her bus seat. Her quiet "no" sparked a year-long boycott that helped change America.

4 min readAges 9+1950s