पौधों की बात सुनने वाला वैज्ञानिक
जगदीश चंद्र बसु ने रेडियो का नाम पड़ने से पहले ही दीवारों के पार अदृश्य तरंगें भेजीं, फिर अपने यंत्रों को एक शांत सवाल की ओर मोड़ा। पौधे क्या महसूस करते हैं?
- 4 मिनट की कहानी
- Ages 10+
- Biography
- 1850s–1930s
1895 में, कलकत्ता के टाउन हॉल में, एक भीड़ एक दुबले-पतले बंगाली प्रोफ़ेसर को कुछ अजीब यंत्रों के पास खड़ा देख रही थी।
कमरे के एक सिरे पर एक छोटी मशीन थी, जो चिंगारी पैदा करती थी। कुछ दूरी पर, बीच में एक दीवार और लोगों के होते हुए, एक घंटी रखी थी, और थोड़ा-सा बारूद। प्रोफ़ेसर ने अपनी मशीन चालू की। कमरे के पार कुछ भी जाता हुआ दिखाई नहीं दिया। फिर भी, दूसरी ओर घंटी बज उठी, और बारूद धुएँ के एक छोटे-से गुबार के साथ फट गया।
वह व्यक्ति थे जगदीश चंद्र बसु। उन्होंने अदृश्य बिजली की तरंगों को ठोस दीवारों के पार भेजा था, और दूसरी तरफ़ उनसे काम करवाया था। दुनिया में कहीं भी इस तरह के सबसे पहले प्रदर्शनों में से यह एक था।
गाँव का स्कूल
जगदीश का जन्म 30 नवंबर 1858 को बंगाल के मैमनसिंह में हुआ, जो आज बांग्लादेश में है। उनके पिता, भगवान चंद्र बसु, एक सरकारी अफ़सर थे, और ज़्यादातर अफ़सरों की तरह अपने बेटे को अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल में भेज सकते थे।
इसके बजाय उन्होंने उसे गाँव के स्कूल में भेजा, जहाँ पढ़ाई बांग्ला में होती थी। जगदीश किसानों और मछुआरों के बेटों के साथ बैठते थे। वे उन्हें जानवरों, पक्षियों और नदी के जीवों की कहानियाँ सुनाते, और जगदीश के मन में प्रकृति के लिए गहरा प्रेम पनपता गया। उनके पिता मानते थे कि बच्चे को सबसे पहले अपनी भाषा और अपने लोगों को जानना चाहिए।
बाद में जगदीश ने कलकत्ता के सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज में पढ़ाई की, और फिर इंग्लैंड गए। पहले उनका इरादा डॉक्टरी पढ़ने का था, लेकिन वे बीमार पड़ गए, और उन्होंने कैम्ब्रिज के क्राइस्ट्स कॉलेज में प्राकृतिक विज्ञान की पढ़ाई शुरू कर दी।
असमान वेतन
1885 में वे भारत लौटे और कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में भौतिकी के प्रोफ़ेसर बने। जल्द ही उन्हें पता चला कि भारतीय होने के कारण उन्हें वही काम करने वाले यूरोपीय प्रोफ़ेसरों से काफ़ी कम तनख़्वाह दी जा रही है।
उन्होंने कम तनख़्वाह लेने से इनकार कर दिया। लगभग तीन साल तक वे बिना कोई वेतन लिए पढ़ाते रहे, हालाँकि इससे उनके परिवार को सचमुच तकलीफ़ उठानी पड़ी। आख़िरकार कॉलेज को झुकना पड़ा। उनका पद पक्का किया गया, और जितने साल उन्होंने काम किया था, उन सबका पूरा वेतन दिया गया।
कॉलेज ने उन्हें कोई ढंग की प्रयोगशाला नहीं दी। उन्होंने एक छोटे-से कमरे में, एक स्थानीय टिन का काम करने वाले कारीगर की मदद से, अपने यंत्र ख़ुद बनाए, और पढ़ाने के बाद शाम को अपना शोध करते रहे।
अदृश्य तरंगें
बसु उन तरंगों में गहरी दिलचस्पी लेने लगे, जिन्हें जर्मन वैज्ञानिक हाइनरिख़ हर्ट्ज़ ने खोजा था: बिजली की ऐसी तरंगें जो रोशनी की तरह फ़ासला तय करती हैं, पर दिखाई नहीं देतीं। बसु ने इन्हें पहले किसी से भी कहीं छोटा बनाया, जिन्हें आज हम माइक्रोवेव कहते हैं, और इन्हें पकड़ने के लिए नए, चतुर डिटेक्टर बनाए।
यही वह विज्ञान था जिससे आगे चलकर रेडियो, रडार और मोबाइल फ़ोन संभव हुए। बसु ने अपने नतीजों पर लंदन और यूरोप में व्याख्यान दिए, और उनकी ख़ूब सराहना हुई।
लेकिन उन्हें इससे पैसा कमाने में कोई रुचि नहीं थी। उनका मानना था कि वैज्ञानिक ज्ञान सबका है। वे पेटेंट लेने से बहुत कतराते थे, और सिर्फ़ एक बार, 1904 में अमेरिका में, दोस्तों के ज़ोर देने पर इसके लिए राज़ी हुए। दूसरों ने रेडियो पर बड़े कारोबार खड़े किए। बसु एक दूसरे सवाल की ओर मुड़ गए।
क्या पौधे महसूस करते हैं?
उन्होंने देखा था कि धातु के उनके डिटेक्टर लंबे इस्तेमाल के बाद मानो "थक" जाते थे, और आराम के बाद फिर ठीक हो जाते थे, कुछ-कुछ जीवित मांसपेशी की तरह। इससे उनके मन में सवाल उठा। अगर धातुएँ ऐसा बर्ताव करती हैं, तो पौधे कैसा करते होंगे?
अपने काम के बाक़ी सारे साल उन्होंने इसी का जवाब खोजने में लगाए। उन्होंने बेहद संवेदनशील यंत्र बनाए। इनमें सबसे मशहूर, क्रेस्कोग्राफ़, पौधे की बढ़त को हज़ारों गुना बड़ा करके दिखा सकता था, ताकि बढ़ती हुई कोंपल की हरकत, जो आँख के लिए बहुत धीमी होती है, देखी और दर्ज की जा सके।
उन्होंने दिखाया कि पौधे छूने, गर्मी, रोशनी, चोट और ज़हर पर बहुत छोटे-छोटे बिजली के संकेतों से जवाब देते हैं, कुछ हद तक जानवरों की नसों के संकेतों की तरह। उनके समय के कुछ वैज्ञानिकों को इस पर शक था, और उनके सारे विचार स्वीकार नहीं किए गए हैं। लेकिन आज वैज्ञानिक सचमुच अध्ययन करते हैं कि पौधे बिजली के संकेतों का कैसे इस्तेमाल करते हैं, और बसु को एक अग्रदूत के रूप में याद किया जाता है।
विज्ञान का मंदिर
1917 में अपने जन्मदिन पर बसु ने कलकत्ता में बोस इंस्टीट्यूट खोला। यह एक शोध केंद्र था, जिसे उन्होंने विज्ञान का मंदिर कहा, जो भारत और दुनिया के लिए खोज के लिए खुला रहे। उसी साल उन्हें 'सर' की उपाधि मिली, और 1920 में वे लंदन की रॉयल सोसाइटी के फ़ेलो बने।
वे कवि रवींद्रनाथ टैगोर के घनिष्ठ मित्र भी थे, और उन्होंने बांग्ला की सबसे शुरुआती विज्ञान-कथाओं में से एक लिखी।
जगदीश चंद्र बसु का निधन 23 नवंबर 1937 को हुआ, अपने उन्यासीवें जन्मदिन से एक हफ़्ता पहले। उनका बनाया संस्थान आज भी काम कर रहा है। 2012 में दुनिया की प्रमुख इंजीनियरिंग संस्था ने माइक्रोवेव पर उनके शुरुआती काम के सम्मान में कोलकाता में एक पट्टिका लगाई।
और पढ़ना चाहते हैं?
पैट्रिक गेडेस की किताब The Life and Work of Sir Jagadis C. Bose, जो बसु के जीवनकाल में ही लिखी गई थी, उनके प्रयोगों का विस्तार से वर्णन करती है। सुब्रत दासगुप्ता की Jagadis Chandra Bose and the Indian Response to Western Science उन्हें भारतीय विज्ञान के इतिहास में उनकी जगह पर रखकर देखती है।