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History

बस की वह सीट

1 दिसंबर 1955 को अलबामा के मॉन्टगोमरी शहर में रोज़ा पार्क्स ने बस में अपनी सीट छोड़ने से इनकार कर दिया। उनकी शांत "ना" से साल भर चला एक बहिष्कार भड़क उठा, जिसने अमेरिका को बदलने में मदद की।

  • 4 मिनट का पाठ
  • Ages 9+
  • Historical narrative
  • 1950s

ध्यान दें: इस कहानी में नस्ली भेदभाव और हिंसा की धमकियों का ज़िक्र है।

इस भाषा में पढ़ें

1955 में, अमेरिका के दक्षिणी हिस्से में बसे अलबामा राज्य के मॉन्टगोमरी शहर में, बसों के अपने नियम थे।

ये रंगभेद के नियम थे, जिन्हें "जिम क्रो" क़ानून कहा जाता था। क़ानून के ज़रिए अश्वेत और श्वेत लोगों को अलग-अलग रखा जाता था, स्कूलों में, रेस्तराँ में, सिनेमाघरों में, पानी पीने के नलों पर और बसों में।

मॉन्टगोमरी की बसों में सीटों की आगे की क़तारें श्वेत यात्रियों के लिए आरक्षित थीं। अश्वेत यात्रियों को, जो बसों में सफ़र करने वालों में ज़्यादातर थे, पीछे बैठना पड़ता था। बीच में एक हिस्सा था जहाँ अश्वेत यात्री बैठ सकते थे, लेकिन सिर्फ़ तब तक, जब तक किसी श्वेत यात्री को सीट की ज़रूरत न हो। तब ड्राइवर अश्वेत यात्रियों की पूरी क़तार को खड़े होकर पीछे जाने का हुक्म दे सकता था।

अश्वेत यात्रियों को अक्सर आगे जाकर किराया देना पड़ता, फिर उतरकर घूमकर पिछले दरवाज़े से चढ़ना पड़ता। कभी-कभी उनके चढ़ने से पहले ही ड्राइवर बस आगे बढ़ा देते थे।

रोज़ा पार्क्स

रोज़ा पार्क्स बयालीस साल की थीं। वे मॉन्टगोमरी शहर के बीचोंबीच एक डिपार्टमेंट स्टोर में दर्ज़िन का काम करती थीं।

वे एक समर्पित कार्यकर्ता भी थीं। दस साल से ज़्यादा समय से वे नेशनल एसोसिएशन फ़ॉर द एडवांसमेंट ऑफ़ कलर्ड पीपल, यानी एनएएसीपी, की मॉन्टगोमरी शाखा की सचिव थीं, जो नागरिक अधिकारों के लिए काम करती थी। उन्होंने अश्वेत लोगों के साथ हुए अन्याय और हिंसा के मामलों की छानबीन की थी, और बार-बार वोट देने के लिए अपना नाम दर्ज करवाने की कोशिश की थी, जिसे अधिकारी अश्वेत नागरिकों के लिए बेहद मुश्किल बना देते थे।

कुछ ही महीने पहले उन्होंने नागरिक अधिकारों और सामुदायिक संगठन पर एक प्रशिक्षण कार्यशाला में भी हिस्सा लिया था।

1 दिसंबर 1955

गुरुवार, 1 दिसंबर को काम के बाद रोज़ा पार्क्स घर जाने के लिए क्लीवलैंड एवेन्यू वाली बस में चढ़ीं। वे बीच वाले हिस्से की पहली क़तार में बैठ गईं।

आगे के एक स्टॉप पर और श्वेत यात्री चढ़े, और श्वेत हिस्सा भर गया। एक श्वेत आदमी खड़ा रह गया।

ड्राइवर, जेम्स ब्लेक, ने रोज़ा पार्क्स वाली क़तार के चारों अश्वेत यात्रियों से खड़े होकर पीछे जाने को कहा। उनमें से तीन चले गए।

रोज़ा पार्क्स नहीं गईं।

ड्राइवर ने उनसे पूछा कि क्या वे खड़ी होने वाली हैं। उन्होंने कहा, नहीं। उसने कहा कि वह उन्हें गिरफ़्तार करवा देगा। उन्होंने उससे कहा कि वह ऐसा कर सकता है।

थकी नहीं थीं

बाद में बहुत-से लोगों ने कहा कि रोज़ा पार्क्स ने इसलिए इनकार किया था क्योंकि काम के लंबे दिन के बाद उनके पैर थक गए थे।

उन्होंने कहा कि यह सच नहीं था। अपनी आत्मकथा में उन्होंने समझाया कि वे शरीर से थकी नहीं थीं, या कम से कम काम के दिन के आख़िर में जितना आम तौर पर थकती थीं, उससे ज़्यादा नहीं। वे बूढ़ी भी नहीं थीं, हालाँकि कुछ लोग उन्हें ऐसा ही समझते थे। उन्होंने लिखा कि अगर वे किसी चीज़ से थकी थीं, तो बस झुकते-झुकते थक गई थीं।

पुलिस वाले आए और उन्हें गिरफ़्तार कर लिया। उन्हें थाने ले जाया गया, उनकी उँगलियों के निशान लिए गए और उन्हें हवालात में डाल दिया गया। उसी शाम बाद में उन्हें ज़मानत पर छोड़ दिया गया।

बहिष्कार

मॉन्टगोमरी के अश्वेत नेता ऐसे ही किसी मामले का इंतज़ार कर रहे थे। रोज़ा पार्क्स की बहुत इज़्ज़त थी, वे शांत और गरिमामय थीं, और उनकी गिरफ़्तारी से लोग ग़ुस्से में आ गए।

उस रात कॉलेज की एक शिक्षिका और वीमेन्स पॉलिटिकल काउंसिल की नेता, जो ऐन रॉबिन्सन, अपने साथियों और छात्रों के साथ रात भर जागकर एक पर्चे की दसियों हज़ार प्रतियाँ बनाती रहीं। उसमें मॉन्टगोमरी के हर अश्वेत व्यक्ति से कहा गया था कि सोमवार, 5 दिसंबर को, जिस दिन रोज़ा पार्क्स का मुक़दमा था, बसों में सफ़र न करें।

सोमवार की सुबह बसें लगभग ख़ाली थीं।

उस शाम खचाखच भरे एक चर्च में हुई सभा में समुदाय ने वोट देकर तय किया कि जब तक उनके साथ बराबरी का बर्ताव नहीं होता, बहिष्कार जारी रहेगा। इसकी अगुवाई के लिए उन्होंने एक नया संगठन बनाया, मॉन्टगोमरी इम्प्रूवमेंट एसोसिएशन, और उसका अध्यक्ष एक युवा पादरी को चुना, जो कुछ ही समय पहले शहर में आए थे। वे छब्बीस साल के थे, और उनका नाम था मार्टिन लूथर किंग जूनियर।

381 दिन

बहिष्कार एक साल से भी ज़्यादा चला।

मॉन्टगोमरी के अश्वेत लोग गर्मी और बारिश में पैदल काम पर जाते, कभी-कभी कई मील चलकर। उन्होंने सैकड़ों कारों वाली एक बहुत बड़ी कारपूल व्यवस्था बनाई। अश्वेत टैक्सी ड्राइवर बस के किराए जितना ही पैसा लेते। चर्चों ने लोगों को ले जाने के लिए स्टेशन वैगन गाड़ियाँ ख़रीदीं।

यह आसान नहीं था। बहुत-से लोगों की नौकरियाँ चली गईं। नेता गिरफ़्तार किए गए। डॉ. किंग के घर पर बम फेंका गया। रोज़ा पार्क्स की डिपार्टमेंट स्टोर वाली नौकरी चली गई, और उन्हें धमकियाँ मिलीं।

लेकिन वे डटे रहे।

इस बीच वकीलों ने बसों में रंगभेद वाले क़ानूनों को अदालत में चुनौती दी। ब्राउडर बनाम गेल मामले में एक संघीय अदालत ने फ़ैसला दिया कि मॉन्टगोमरी की बसों में रंगभेद असंवैधानिक है। नवंबर 1956 में अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने इस फ़ैसले को बरक़रार रखा।

20 दिसंबर 1956 को यह आदेश मॉन्टगोमरी पहुँचा। अगली सुबह, 381 दिनों के बाद, मॉन्टगोमरी के अश्वेत नागरिक फिर से बसों में चढ़े और जहाँ चाहा वहाँ बैठे।

उसके बाद

मॉन्टगोमरी बस बहिष्कार नागरिक अधिकार आंदोलन की पहली बड़ी जीतों में से एक था, और इसने मार्टिन लूथर किंग जूनियर को राष्ट्रीय नेता बना दिया। अगले दशक में लाखों अमेरिकियों ने रंगभेद ख़त्म करने के लिए आंदोलन किया, जिसके नतीजे में 1964 का सिविल राइट्स एक्ट और 1965 का वोटिंग राइट्स एक्ट बने।

रोज़ा पार्क्स और उनके पति डेट्रॉइट चले गए, जहाँ वे ज़िंदगी भर नागरिक अधिकारों के लिए काम करती रहीं। 2005 में बानवे साल की उम्र में उनका निधन हुआ। वे पहली महिला बनीं जिनके पार्थिव शरीर को सम्मान के साथ अमेरिकी कैपिटल में रखा गया।

उस दिन वे जिस बस में सफ़र कर रही थीं, वह अब मिशिगन के हेनरी फ़ोर्ड म्यूज़ियम में रखी है।

और पढ़ना चाहते हैं?

रोज़ा पार्क्स ने अपनी कहानी Rosa Parks: My Story में सुनाई है। जीन थियोहैरिस की The Rebellious Life of Mrs. Rosa Parks दिखाती है कि वे ज़िंदगी भर एक कार्यकर्ता रहीं, न कि सिर्फ़ एक थकी हुई दर्ज़िन। डॉ. किंग की Stride Toward Freedom बहिष्कार को भीतर से देखकर बयान करती है।

Want to read more?

This story is told briefly. For the full, detailed account, these books and records go deeper:

  1. Rosa Parks with Jim Haskins, Rosa Parks: My Story. Dial Books, 1992.
  2. Jeanne Theoharis, The Rebellious Life of Mrs. Rosa Parks. Beacon Press, 2013.
  3. Martin Luther King Jr., Stride Toward Freedom: The Montgomery Story. Harper & Brothers, 1958.

About this story

This is a translation of the original English story. It was prepared with AI assistance and is awaiting review by a native speaker.

This story is awaiting final editorial fact-checking. If you spot an error, please let us know.

Shared on 1Kahani for reading and awareness. All credit for the research belongs to the authors and records listed under "Want to read more?". Based on Rosa Parks's autobiography and published histories; her words are paraphrased, not quoted.

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