स्वार्थी दैत्य
एक दैत्य अपने सुंदर बाग़ से बच्चों को दूर रखने के लिए दीवार खड़ी कर देता है। फिर वसंत वहाँ आने से इनकार कर देता है। ऑस्कर वाइल्ड की परी-कथा, एक दिल के खुलने के बारे में।
- 6 मिनट का पाठ
- Ages 6+
- Classic retold
- 1880s
हर दोपहर, स्कूल से घर लौटते हुए, बच्चे दैत्य के बाग़ में खेलने जाया करते थे।
वह एक बड़ा, प्यारा बाग़ था, जिसमें मुलायम हरी घास थी। घास पर यहाँ-वहाँ तारों जैसे सुंदर फूल खिले रहते थे, और वहाँ आड़ू के बारह पेड़ थे, जिन पर वसंत में गुलाबी और मोती जैसे सफ़ेद नाज़ुक बौर आ जाते थे, और पतझड़ में भरपूर फल लगते थे। चिड़ियाँ पेड़ों पर बैठकर इतना मीठा गातीं कि बच्चे अपने खेल रोककर उन्हें सुनने लगते।
"हम यहाँ कितने ख़ुश हैं!" वे एक-दूसरे से चिल्लाकर कहते।
दैत्य घर लौटता है
एक दिन दैत्य लौट आया। वह कॉर्नवाल में अपने दोस्त, एक राक्षस, से मिलने गया था और सात साल तक उसी के पास रहा था। जब वह पहुँचा और उसने बच्चों को बाग़ में खेलते देखा, तो उसे बहुत ग़ुस्सा आया।
"तुम लोग यहाँ क्या कर रहे हो?" वह भारी, रूखी आवाज़ में चिल्लाया, और बच्चे भाग गए।
"मेरा बाग़ मेरा बाग़ है," दैत्य ने कहा। "यह बात कोई भी समझ सकता है। मैं अपने सिवा किसी को इसमें खेलने नहीं दूँगा।"
तो उसने उसके चारों ओर एक ऊँची दीवार बना दी और एक तख़्ती लगा दी:
बिना इजाज़त अंदर आने वालों पर मुक़दमा चलाया जाएगा
वह बहुत ही स्वार्थी दैत्य था।
बेचारे बच्चों के पास अब खेलने की कोई जगह नहीं थी। उन्होंने सड़क पर खेलने की कोशिश की, लेकिन वहाँ धूल थी और सख़्त पत्थर भरे पड़े थे। पढ़ाई ख़त्म होने के बाद वे ऊँची दीवार के चारों ओर घूमा करते और अंदर के सुंदर बाग़ की बातें करते। "हम वहाँ कितने ख़ुश थे," वे कहते।
एक सर्दी जो ख़त्म ही नहीं हुई
फिर वसंत आया, और पूरे देश में नन्हे-नन्हे फूल खिल उठे और नन्ही-नन्ही चिड़ियाँ चहकने लगीं।
सिर्फ़ स्वार्थी दैत्य के बाग़ में अब भी सर्दी थी।
चिड़ियों का वहाँ गाने का मन नहीं करता था, क्योंकि वहाँ बच्चे नहीं थे, और पेड़ खिलना भूल गए थे। एक बार एक सुंदर फूल ने घास में से सिर बाहर निकाला, लेकिन जब उसने तख़्ती देखी, तो उसे बच्चों के लिए इतना दुख हुआ कि वह वापस ज़मीन में सरक गया और सो गया।
ख़ुश थे तो बस बर्फ़ और पाला। "वसंत इस बाग़ को भूल गया है," वे चिल्लाए, "तो हम यहाँ साल भर रहेंगे।" बर्फ़ ने अपनी बड़ी सफ़ेद चादर से घास को ढक दिया, और पाले ने सारे पेड़ों को चाँदी के रंग में रंग दिया। उन्होंने उत्तरी पवन को भी अपने साथ रहने बुला लिया, और वह आ गया, फ़र में लिपटा हुआ, सारा दिन बाग़ में गरजता हुआ और चिमनियों के सिरे उड़ाकर गिराता हुआ। फिर ओले भी आ गए, महल की छत पर खड़खड़ाते हुए।
"मेरी समझ में नहीं आता कि इस बार वसंत इतनी देर से क्यों आ रहा है," स्वार्थी दैत्य ने खिड़की पर बैठे-बैठे अपने ठंडे, सफ़ेद बाग़ को देखते हुए कहा। "उम्मीद है, मौसम बदलेगा।"
लेकिन वसंत कभी नहीं आया, न ही गर्मी। शरद ऋतु ने हर बाग़ को सुनहरे फल दिए, पर दैत्य के बाग़ को एक भी नहीं। "वह बहुत स्वार्थी है," उसने कहा।
संगीत
एक सुबह दैत्य बिस्तर में जागा हुआ लेटा था, तभी उसे कोई प्यारा-सा संगीत सुनाई दिया। वह इतना मीठा था कि उसे लगा, ज़रूर राजा के संगीतकार पास से गुज़र रहे होंगे। असल में वह बस एक छोटी-सी लिनेट चिड़िया थी जो उसकी खिड़की के बाहर गा रही थी, लेकिन उसने इतने लंबे समय से किसी चिड़िया का गाना नहीं सुना था कि उसे वह दुनिया का सबसे सुंदर संगीत लगा।
ओलों ने नाचना बंद कर दिया। उत्तरी पवन ने गरजना बंद कर दिया। खुली खिड़की से एक भीनी-भीनी, मनभावन ख़ुशबू अंदर आई।
"लगता है, आख़िरकार वसंत आ गया," दैत्य ने कहा, और वह बिस्तर से कूदकर बाहर झाँकने लगा।
उसने एक बहुत ही अद्भुत दृश्य देखा। दीवार के एक छोटे-से छेद से बच्चे रेंगकर अंदर आ गए थे और पेड़ों की डालियों पर बैठे थे। उसे जितने पेड़ दिख रहे थे, हर एक पर कोई न कोई छोटा बच्चा था। और पेड़ बच्चों के लौट आने से इतने ख़ुश थे कि उन्होंने ख़ुद को फूलों से ढक लिया था और बच्चों के सिरों के ऊपर अपनी बाँहें धीरे-धीरे हिला रहे थे। चिड़ियाँ ख़ुशी से इधर-उधर उड़ रही थीं और गा रही थीं, और फूल हरी घास में से ऊपर झाँककर हँस रहे थे।
बस एक कोने में अब भी सर्दी थी। वह बाग़ का सबसे दूर वाला कोना था, और वहाँ एक छोटा लड़का खड़ा था। वह इतना छोटा था कि पेड़ की डालियों तक उसका हाथ नहीं पहुँचता था, और वह फूट-फूटकर रोता हुआ पेड़ के चारों ओर चक्कर लगा रहा था। वह पेड़ अब भी पाले और बर्फ़ से ढका था, और उत्तरी पवन उसके ऊपर बह रहा था।
"ऊपर चढ़ आओ, नन्हे लड़के," पेड़ ने अपनी डालियाँ जितना हो सका नीचे झुकाते हुए कहा। लेकिन लड़का बहुत ही छोटा था।
दीवार गिरती है
बाहर देखते-देखते दैत्य का दिल पिघल गया।
"मैं कितना स्वार्थी रहा हूँ!" उसने कहा। "अब मुझे समझ आया कि वसंत यहाँ क्यों नहीं आ रहा था। मैं उस बेचारे नन्हे लड़के को पेड़ के ऊपर बिठा दूँगा, और फिर दीवार गिरा दूँगा, और मेरा बाग़ हमेशा-हमेशा के लिए बच्चों के खेलने की जगह बन जाएगा।"
वह दबे पाँव नीचे उतरा, सामने का दरवाज़ा बहुत धीरे से खोला और बाग़ में चला गया। लेकिन बच्चों ने जब उसे देखा, तो वे इतना डर गए कि सब भाग गए, और बाग़ में फिर से सर्दी छा गई।
सिर्फ़ वह छोटा लड़का नहीं भागा, क्योंकि उसकी आँखें आँसुओं से इतनी भरी थीं कि उसने दैत्य को आते देखा ही नहीं। और दैत्य चुपचाप उसके पीछे आया, उसे प्यार से अपने हाथ में उठाया और पेड़ पर बिठा दिया।
उसी पल पेड़ फूलों से भर गया, और चिड़ियाँ आकर उस पर गाने लगीं। नन्हे लड़के ने अपनी दोनों बाँहें फैलाईं, उन्हें दैत्य की गर्दन में डाल दिया और उसे चूम लिया।
जब बाक़ी बच्चों ने देखा कि दैत्य अब बुरा नहीं रहा, तो वे दौड़ते हुए वापस आ गए, और उनके साथ वसंत भी आ गया।
"अब यह तुम्हारा बाग़ है, प्यारे बच्चो," दैत्य ने कहा। उसने एक बड़ी कुल्हाड़ी उठाई और दीवार गिरा दी। और जब लोग बारह बजे बाज़ार जा रहे थे, तो उन्होंने दैत्य को बच्चों के साथ खेलते देखा, उस बाग़ में जो उन्होंने अब तक देखे सारे बाग़ों में सबसे सुंदर था।
नन्हा लड़का
बच्चे सारा दिन खेलते रहे, और शाम को वे विदा लेने आए।
"लेकिन तुम्हारा वह नन्हा साथी कहाँ है?" दैत्य ने पूछा। "वह लड़का जिसे मैंने पेड़ पर बिठाया था?" दैत्य उसे सबसे ज़्यादा प्यार करता था, क्योंकि उसने उसे चूमा था।
"हमें नहीं पता," बच्चों ने कहा। "वह चला गया।"
बच्चे हर दोपहर आते, लेकिन वह नन्हा लड़का, जिसे दैत्य प्यार करता था, फिर कभी दिखाई नहीं दिया। दैत्य सभी बच्चों के साथ बहुत अच्छा बर्ताव करता था, फिर भी वह अपने पहले नन्हे दोस्त के लिए तरसता था, और अक्सर उसकी बातें करता था।
साल बीतते गए, और दैत्य बहुत बूढ़ा और कमज़ोर हो गया। वह अब खेल नहीं पाता था, इसलिए एक बहुत बड़ी आरामकुर्सी पर बैठकर बच्चों को खेलते देखता और अपने बाग़ को निहारता रहता। "मेरे पास बहुत-से सुंदर फूल हैं," वह कहता, "लेकिन सबसे सुंदर फूल तो बच्चे हैं।"
आख़िरी वसंत
सर्दी की एक सुबह, कपड़े पहनते हुए, उसने अपनी खिड़की से बाहर देखा। अब वह सर्दी से नफ़रत नहीं करता था, क्योंकि वह जानता था कि सर्दी बस सोया हुआ वसंत है।
अचानक उसने हैरानी से अपनी आँखें मलीं। बाग़ के सबसे दूर वाले कोने में एक पेड़ प्यारे सफ़ेद फूलों से पूरी तरह ढका खड़ा था। उसकी डालियाँ सुनहरी थीं, और उनसे चाँदी के फल लटक रहे थे। और उसके नीचे वही नन्हा लड़का खड़ा था जिसे वह प्यार करता था।
दैत्य बड़ी ख़ुशी से दौड़ता हुआ नीचे उतरा और बाग़ में निकल गया। वह जल्दी-जल्दी घास पार करके बच्चे के पास पहुँचा। लेकिन जब वह बिल्कुल पास आया, तो उसका चेहरा ग़ुस्से से लाल हो गया।
"किसकी इतनी हिम्मत हुई कि तुम्हें घायल करे?" वह चिल्लाया। क्योंकि बच्चे की हथेलियों पर दो कीलों के निशान थे, और दो कीलों के निशान उसके नन्हे पैरों पर भी थे।
"नहीं," बच्चे ने जवाब दिया। "ये प्रेम के घाव हैं।"
दैत्य पर एक अजीब-सी श्रद्धा और भय छा गया, और वह उस नन्हे बच्चे के सामने घुटनों के बल बैठ गया।
बच्चे ने दैत्य की ओर देखकर मुस्कुराते हुए कहा, "तुमने एक बार मुझे अपने बाग़ में खेलने दिया था। आज तुम मेरे साथ मेरे बाग़ में चलोगे, जो स्वर्ग है।"
और उस दोपहर जब बच्चे दौड़ते हुए अंदर आए, तो उन्होंने दैत्य को उस पेड़ के नीचे मरा पड़ा पाया, सफ़ेद फूलों से पूरी तरह ढका हुआ।
इस कहानी के बारे में
"द सेल्फ़िश जायंट" (स्वार्थी दैत्य) ऑस्कर वाइल्ड ने 1888 में The Happy Prince and Other Tales में प्रकाशित की थी। इसके अंत में ईसाई धर्म के प्रतीकों का सहारा लिया गया है। यह कहानी का एक छोटा किया हुआ पुनर्कथन है, जो कहीं-कहीं वाइल्ड के शब्दों के काफ़ी क़रीब रहता है; मूल कहानी पब्लिक डोमेन में है।