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Reflection

छोटी लकीर

बादशाह अकबर फ़र्श पर एक लकीर खींचते हैं और दरबार के सामने एक पहेली रखते हैं। इसे छोटा करो, वे कहते हैं, बिना इसे छुए।

  • 4 मिनट का पाठ
  • All ages
  • Fable & folk tale
  • Mughal India, 16th century
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उस सुबह महल का बड़ा दरबार भरा हुआ था, और बादशाह राज-काज से ऊब चुके थे।

अर्ज़ियाँ सुनी जा चुकी थीं। रिपोर्टें पढ़ी जा चुकी थीं। राजदूत झुककर सलाम कर चुके थे, उनका शुक्रिया अदा हो चुका था और वे जा चुके थे। दरबारी अपनी-अपनी क़तारों में खड़े थे, जाने की इजाज़त का इंतज़ार करते हुए, गरम हवा में थोड़ा कसमसाते हुए।

बादशाह अकबर ने उन सब पर नज़र डाली। फिर उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

"मेरे लिए चॉक का एक टुकड़ा लाओ," उन्होंने कहा।

फ़र्श पर एक लकीर

एक सेवक चॉक ले आया। सबको हैरान करते हुए बादशाह अपने तख़्त से उठे, सीढ़ियाँ उतरे, और चिकने पत्थर के फ़र्श पर घुटनों के बल बैठ गए।

एक ही सधे हुए हाथ से उन्होंने एक लंबी, सीधी, सफ़ेद लकीर खींच दी।

वे खड़े हुए, हाथ झाड़े और अपने दरबार की ओर देखा।

"तुम्हारे लिए एक पहेली है," उन्होंने कहा। "मैं चाहता हूँ कि यह लकीर छोटी कर दी जाए। लेकिन तुम इसका कोई हिस्सा मिटा नहीं सकते। तुम इसे काट नहीं सकते, धुँधला नहीं कर सकते, या किसी भी तरह बदल नहीं सकते। बल्कि तुम इसे छू भी नहीं सकते।"

दरबार में खुसर-फुसर होने लगी।

"छोटी, जहाँपनाह?" एक वज़ीर ने कहा। "बिना छुए?"

"बिना छुए," अकबर ने कहा, और देखने के लिए वापस अपने तख़्त पर जा बैठे।

दरबार कोशिश करता है

दरबारी लकीर के चारों ओर इकट्ठा होकर उसे घूरने लगे, जैसे वह अपने आप सिकुड़ जाएगी।

उनमें से एक घुटनों के बल बैठा, उसे पास से ग़ौर से देखा, और सिर हिलाता हुआ फिर खड़ा हो गया। "यह नहीं हो सकता," उसने अपने पड़ोसी से धीरे से कहा। "अगर मिटा नहीं सकते, तो यह जितनी लंबी है उतनी ही रहेगी।"

दूसरा अपने क़दम गिनता हुआ लकीर के एक सिरे से दूसरे सिरे तक चला। उससे कुछ नहीं हुआ।

तीसरे को एक तरकीब सूझी और उसका चेहरा खिल उठा। "जहाँपनाह, अगर हम इसे दूर से, दरबार के बिल्कुल आख़िरी छोर से देखें, तो यह छोटी लगती है!"

अकबर हँसे। "तो मैं इसे पास से देखूँगा," उन्होंने कहा, "और यह फिर से लंबी हो जाएगी।"

चौथे ने सुझाव दिया कि इसके आधे हिस्से पर एक कपड़ा डाल दिया जाए। "तब तुम इसे छिपा रहे होगे," बादशाह ने कहा, "छोटा नहीं कर रहे होगे। और कपड़ा इसे छू लेगा।"

एक-एक करके साम्राज्य के सबसे चतुर लोग चुप हो गए। वे कभी एक-दूसरे को देखते, कभी लकीर को, कभी फ़र्श को। उनमें से कुछ थोड़े नाराज़ दिख रहे थे, जैसे बादशाह ने कोई बेईमानी वाली चाल चल दी हो।

तभी किसी ने कहा, "बीरबल कहाँ हैं?"

बीरबल चॉक उठाते हैं

बीरबल दरबार के पिछले हिस्से में चुपचाप खड़े थे। अब वे आगे आए, बादशाह को सलाम किया और नीचे लकीर की ओर देखा।

उन्होंने उसे बस एक पल के लिए देखा।

फिर उन्होंने चॉक उठाई, बादशाह की लकीर के पास घुटनों के बल बैठे, और उसके बराबर में, उसके समानांतर, एक और लकीर खींच दी। उनकी लकीर भी बादशाह की लकीर की तरह सीधी और सधी हुई थी।

लेकिन वह लंबी थी। बहुत लंबी।

बीरबल खड़े हुए और पीछे हट गए।

दरबारियों ने पत्थर के फ़र्श पर अगल-बगल पड़ी दोनों लकीरों को देखा। और अचानक, बादशाह की लकीर, जिसे किसी ने छुआ तक नहीं था, छोटी दिखने लगी।

सन्नाटा छा गया। फिर अकबर ताली बजाने लगे, और जल्द ही पूरा दरबार उनके साथ तालियाँ बजा रहा था।

"शाबाश, बीरबल," बादशाह ने कहा। "इन्हें समझाओ।"

चॉक में छिपा सबक़

बीरबल दरबार की ओर मुड़े।

"जहाँपनाह की लकीर नहीं बदली है," उन्होंने कहा। "यह ठीक उतनी ही लंबी है जितनी एक पल पहले थी। हममें से किसी ने इसे मिटाया नहीं, काटा नहीं, छुआ नहीं। लेकिन कोई भी चीज़ अपने आप में लंबी या छोटी नहीं होती। कोई चीज़ तभी छोटी दिखती है जब उसके पास कोई ज़्यादा लंबी चीज़ हो।"

उन्होंने चॉक सेवक को लौटा दी।

"आप सब इस लकीर को छोटा करने की कोशिश कर रहे थे," उन्होंने आगे कहा, "और आप इसे बिगाड़े बिना ऐसा नहीं कर सकते थे। इसलिए मैंने इसकी जगह एक लंबी लकीर खींच दी।"

बादशाह ने धीरे से सिर हिलाया, और जब वे फिर बोले, तो अब वे कोई खेल नहीं खेल रहे थे।

"यह याद रखना," उन्होंने दरबार से कहा, "अगली बार जब तुम्हें किसी से जलन हो। जब कोई और दरबार में ऊपर उठे, या कोई इनाम जीते, या उसकी तारीफ़ हो, तो मन करता है कि उसकी लकीर का थोड़ा-सा हिस्सा मिटा दिया जाए। उसके ख़िलाफ़ बोला जाए। उसे छोटा किया जाए। लेकिन इससे बस चीज़ें बिगड़ती हैं, और तुम एक इंच भी लंबे नहीं होते।"

उन्होंने फ़र्श पर चॉक की दोनों लकीरों की ओर देखा।

"अगर तुम किसी से ऊँचा खड़ा होना चाहते हो," उन्होंने कहा, "तो उसे काटकर छोटा मत करो। ख़ुद बढ़ो।"

उसके बाद बहुत देर तक दरबार में ख़ामोशी रही। और वे दोनों लकीरें पूरे दिन फ़र्श पर रहने दी गईं, ताकि दरबार से गुज़रने वाला हर कोई उन्हें देख सके।

इस कहानी के बारे में

अकबर ने 1556 से 1605 तक मुग़ल साम्राज्य पर राज किया, और बीरबल उनके सबसे भरोसेमंद दरबारियों में से एक थे। वे असली लोग थे, लेकिन बीरबल के चतुर जवाबों की बहुत-सी कहानियाँ लोककथाएँ हैं, जो भारत में पीढ़ियों से सुनाई जा रही हैं। यह उनमें सबसे मशहूर कहानियों में से एक है, और बाक़ी सबकी तरह हर कहने वाले के साथ थोड़ी-सी बदल जाती है। यह कहानी का एक छोटा और सरल किया हुआ रूप है।

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