← Back to stories

Reflection

पत्थर-तराश

एक पत्थर-तराश हर दिन एक पहाड़ को छेनी से काटता है और चाहता है कि काश वह कोई बड़ा आदमी होता। फिर, एक-एक करके, उसकी इच्छाएँ पूरी होने लगती हैं।

  • 4 मिनट की कहानी
  • Ages 8+
  • Fable & folk tale
  • Traditional Japan
इस भाषा में पढ़ें

हर सुबह, जब पहाड़ियों से धुंध छँटती, पत्थर-तराश चढ़कर उस बड़े पहाड़ की तलहटी तक जाता और काम शुरू कर देता।

ठक, ठक, ठक बजता उसका हथौड़ा। टन, टन करती उसकी छेनी। धीरे-धीरे, एक-एक शिला करके, वह पहाड़ की ढलान से धूसर पत्थर काटता, और नीचे शहर के राजमिस्त्री उसे घरों, दीवारों और मंदिर की सीढ़ियों के लिए ख़रीद लेते।

यह कड़ा, धूल भरा काम था, और इसमें ज़्यादा कमाई नहीं थी। पर उसकी बाँहें मज़बूत थीं, उसकी नज़र पक्की थी, और बरसों तक वह संतुष्ट रहा।

लोग कहते थे कि उस पहाड़ में एक आत्मा रहती है, जो कभी-कभी इच्छाएँ पूरी कर देती है। पत्थर-तराश ने उस बात पर कभी ज़्यादा ध्यान नहीं दिया था।

अमीर आदमी

एक दिन वह पत्थरों का एक बोझ लेकर एक अमीर आदमी के घर गया।

खुले फाटक से उसे रेशमी गद्दियाँ, रंगे हुए परदे, खाने की थालियाँ लिए आते-जाते नौकर दिखे। दिन की गर्मी में अमीर आदमी एक नरम दीवान पर लेटा था, और कोई उसे पंखा झल रहा था।

पत्थर-तराश ने अपने धूल भरे हाथों की तरफ़ देखा।

घर लौटते हुए उसने आह भरी। "काश मैं एक अमीर आदमी होता," उसने कहा, "और दिन भर नरम दीवान पर लेटा रहता।"

और एक आवाज़ ने, जो चट्टान में गूँजती गड़गड़ाहट जितनी गहरी थी, जवाब दिया: तुम्हारी इच्छा पूरी हुई।

जब वह घर पहुँचा, तो उसकी झोंपड़ी एक शानदार घर बन चुकी थी, जिसमें रेशमी गद्दियाँ और रंगे हुए परदे थे, और दरवाज़े पर नौकर इंतज़ार कर रहे थे। पत्थर-तराश अमीर आदमी बन गया था।

राजकुमार

कुछ समय तक वह बहुत ख़ुश रहा।

फिर, एक गर्म दोपहर, उसने खिड़की से बाहर देखा तो एक राजकुमार की सवारी जा रही थी। राजकुमार एक सुनहरी गाड़ी में बैठा था, आगे-आगे सिपाही चल रहे थे, और नौकर धूप से बचाने के लिए उसके सिर पर छत्र ताने हुए थे। गली में हर कोई उसके गुज़रते समय झुककर सलाम कर रहा था। अमीर आदमी ने भी सलाम किया।

"राजकुमार के आगे अमीर आदमी कुछ भी नहीं," उसने सोचा। "काश मैं राजकुमार होता।"

तुम्हारी इच्छा पूरी हुई, पहाड़ की आवाज़ ने कहा।

और वह राजकुमार बन गया, सुनहरी गाड़ी के साथ, आगे चलते सिपाहियों के साथ, और सिर पर तने छत्र के साथ।

सूरज, बादल और पहाड़

पर गर्मी और बढ़ती गई। सूरज धरती पर आग बरसाने लगा। छत्र के बावजूद राजकुमार को अपना चेहरा जलता महसूस होता, और उसने खेतों को भूरा होते और घास को मुरझाते देखा।

"सूरज किसी भी राजकुमार से ज़्यादा ताक़तवर है," उसने कहा। "काश मैं सूरज होता।"

तुम्हारी इच्छा पूरी हुई।

तो वह सूरज बन गया, और अपनी ताक़त पर इतराता हुआ दुनिया पर आग बरसाने लगा। उसने खेत झुलसा दिए और नदियाँ सुखा दीं, और नीचे लोग उससे छिपने लगे।

फिर एक बादल उसके चेहरे के आगे आ गया। और सूरज की रोशनी उसके पार नहीं जा सकी।

"बादल सूरज से ज़्यादा ताक़तवर है," उसने कहा। "काश मैं बादल होता।"

तुम्हारी इच्छा पूरी हुई।

वह एक बड़ा, काला बादल बन गया, और मूसलाधार बरसने लगा। नदियाँ उफन पड़ीं। गाँव बह गए, और खेत डूब गए। पेड़ जड़ों समेत उखड़ गए।

पर जब उसने नीचे देखा, तो उसे दिखा कि एक चीज़ ऐसी थी जिसे बारिश हिला नहीं सकी। वह बड़ा पहाड़ ठीक वहीं खड़ा था जहाँ वह हमेशा से खड़ा था, धूसर और मौन, अछूता।

"पहाड़ बादल से ज़्यादा ताक़तवर है," उसने कहा। "काश मैं पहाड़ होता।"

तुम्हारी इच्छा पूरी हुई।

ठक, ठक, ठक

तो वह पहाड़ बन गया। अब वह सबसे ताक़तवर था। सूरज उसे जला नहीं सकता था। बारिश उसे बहा नहीं सकती थी। वह दुनिया के ऊपर ऊँचा खड़ा था, और कोई चीज़ उसे हिला नहीं सकती थी।

फिर, एक सुबह, उसे अपने पैरों के पास कुछ महसूस हुआ।

ठक, ठक, ठक। टन, टन।

एक छोटी-सी आकृति पहाड़ की तलहटी तक चढ़ आई थी। वह एक पत्थर-तराश था, हथौड़ा और छेनी लिए, और वह पहाड़ की ढलान से पत्थर की एक शिला काट रहा था। धीरे-धीरे, लगातार, टुकड़ा-टुकड़ा।

पहाड़ उसे रोक नहीं सका।

"यह क्या है?" वह चीख़ा। "हथौड़े वाला एक आदमी पहाड़ से ज़्यादा ताक़तवर है! काश मैं वह आदमी होता।"

और आवाज़ ने आख़िरी बार जवाब दिया: तुम्हारी इच्छा पूरी हुई।

फिर घर

वह फिर से पत्थर-तराश था, उस बड़े पहाड़ की तलहटी में खड़ा, हाथ में हथौड़ा और बाँहों पर पत्थर की धूल लिए।

उसकी झोंपड़ी फिर झोंपड़ी थी। उसके कपड़े सादे थे। काम उतना ही कड़ा था जितना हमेशा था, और उसमें पहले से ज़्यादा कमाई नहीं थी।

पर वह अमीर आदमी रह चुका था और राजकुमार भी, सूरज, बादल और पहाड़ भी। और इन सबके आख़िर में उसने पाया कि जो चीज़ पहाड़ को हिला सकती थी, वह एक ऐसा आदमी था जो हर सुबह उठता था और अपना काम अच्छे से करता था।

उसने अपना हथौड़ा उठाया। ठक, ठक, ठक। और कहते हैं कि उसके बाद उसने फिर कभी कोई और बनने की इच्छा नहीं की।

इस कहानी के बारे में

कहा जाता है कि यह कथा जापान से आई है। यूरोप में यह डच लेखक मुल्टाटुली के ज़रिए जानी गई, जिन्होंने 1860 में अपने मशहूर उपन्यास Max Havelaar में इसे सुनाया, और बाद में एंड्रयू लैंग ने The Crimson Fairy Book में इसे बच्चों के लिए दोबारा लिखा। कुछ संस्करणों का अंत अलग है, पर यह चक्कर हमेशा पत्थर-तराश को घर ले आता है। यह संस्करण छोटा और सरल किया गया पुनर्कथन है।

Read next

ReflectionFable & folk tale

The Golden Touch

A god offers King Midas any wish he likes, and the king already loves gold more than anything. By the next morning, everything he touches shines.

4 min readAll ages✓ ReadAncient Greece
ReflectionFable & folk tale

Mulla Nasruddin and the Coat

Mulla Nasruddin arrives at a rich man's feast in his dusty work clothes, and nobody so much as offers him a seat. So he goes home to change, and comes back to teach the whole room a lesson.

4 min readAges 8+✓ ReadMedieval Anatolia
ReflectionFable & folk tale

The Cracked Pot

Every day for two years, a water carrier walks to the stream with two clay pots. One arrives full. The other, cracked down its side, arrives half empty, and it is ashamed.

4 min readAges 8+✓ ReadTraditional