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बातूनी कछुआ

दो दयालु हंस अपने दोस्त कछुए को एक डंडे के सहारे उड़ाकर नई झील तक ले जाने की पेशकश करते हैं। बस एक ही शर्त है। उसे अपना मुँह नहीं खोलना है।

  • 3 मिनट की कहानी
  • Ages 5–9
  • Fable & folk tale
  • Ancient India
इस भाषा में पढ़ें

भारत की हरी-भरी पहाड़ियों के बीच एक झील में, कभी कम्बुग्रीव नाम का एक कछुआ रहता था।

वह दयालु कछुआ था, और समझदार भी। पर उसकी एक छोटी-सी परेशानी थी। उसे बातें करना बहुत पसंद था। वह नाश्ते पर बातें करता और सोते समय भी बातें करता। वह मछलियों से बातें करता, मेंढकों से बातें करता, और जब कोई न होता, तो कमल के फूलों से बातें करता।

उसके दो सबसे पक्के दोस्त हंसों का एक जोड़ा थे, जिनके नाम संकट और विकट थे। वे हर साल झील पर आते, और उन्हें उसकी बक-बक कभी बुरी नहीं लगती। वे बस हँसकर कहते, "अरे, कम्बुग्रीव!"

बिन बारिश का साल

फिर एक साल ऐसा आया जब बारिश नहीं हुई।

सूरज दिन-ब-दिन तपता रहा। झील छोटी, और छोटी होती गई। कमल मुरझा गए। मेंढक कोई गीली जगह ढूँढने कूदते-फाँदते चले गए। जल्दी ही झील बस कीचड़ का एक गड्ढा रह गई, जिसके किनारे फट गए थे।

"हमें जाना होगा," एक शाम संकट ने कहा। "हम एक बड़ी झील जानते हैं, बहुत दूर, पहाड़ियों के उस पार। उसमें अब भी ठंडा, साफ़ पानी भरा है।"

"पर हमारे दोस्त का क्या?" विकट ने कहा। "कछुए उड़ नहीं सकते।"

कम्बुग्रीव ने फटी हुई कीचड़ की ओर देखा, और इस बार उसके पास कहने को कुछ नहीं था।

एक डंडा और एक तरकीब

अगली सुबह हंस एक लंबा, मज़बूत डंडा लेकर लौटे।

"हमारे पास एक तरकीब है," विकट ने कहा। "हम दोनों इस डंडे का एक-एक सिरा अपनी चोंच में पकड़ेंगे। तुम बीच वाला हिस्सा अपने मुँह में पकड़ लेना। फिर हम उड़ेंगे, और तुम्हें अपने साथ ले चलेंगे।"

"वाह!" कम्बुग्रीव ने कहा। "कितनी बढ़िया तरकीब है! तुम दोनों किसी कछुए को मिल सकने वाले सबसे अच्छे दोस्त हो, और मैं तो हमेशा से यही कहता आया हूँ, और नई झील पर भी सबसे यही कहूँगा, और..."

"बस एक शर्त है," संकट ने नरमी से कहा। "कुछ भी हो जाए, तुम कुछ भी देखो, कोई कुछ भी कहे, तुम्हें अपना मुँह नहीं खोलना है। एक बार भी नहीं। जब तक हम नीचे न उतर जाएँ।"

"बिल्कुल," कम्बुग्रीव ने कहा। "आसान है। मैं एक शब्द भी नहीं बोलूँगा।"

दोनों हंसों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।

ऊपर, और ऊपर

कम्बुग्रीव ने डंडे का बीच वाला हिस्सा कसकर दाँतों में दबा लिया। हंसों ने दोनों सिरे अपनी चोंच में पकड़े। उन्होंने अपने बड़े-बड़े सफ़ेद पंख फड़फड़ाए, और ऊपर उठने लगे, ऊँचे, और ऊँचे, यहाँ तक कि सूखी झील नीचे बस एक छोटा-सा भूरा धब्बा रह गई।

कितना शानदार था। हवा सीटी बजाती हुई पास से गुज़र रही थी। पहाड़ियाँ हरी लहरों की तरह पीछे छूट रही थीं। कम्बुग्रीव ने दुनिया को इतनी ऊँचाई से कभी नहीं देखा था। उसका मन हुआ कि कहे, वह नदी देखो! वे बादल देखो! पर उसने मुँह कसकर बंद रखा।

कुछ देर बाद वे एक गाँव के ऊपर से उड़े। गलियों में खेलते बच्चों ने ऊपर देखा, और उन्हें एक बड़ा अजीब नज़ारा दिखा।

"देखो!" वे चिल्लाए। "दो हंस एक डंडे पर कछुए को ले जा रहे हैं!"

बड़े लोग अपने घरों से दौड़कर बाहर आ गए। जल्दी ही पूरा गाँव उँगली उठाकर हँस रहा था।

"कितना बुद्धू कछुआ है!" किसी ने आवाज़ लगाई। "किसने कभी उड़ता हुआ कछुआ सुना है?"

कम्बुग्रीव का चेहरा तमतमा गया। बुद्धू? उसने सोचा। मैं बुद्धू नहीं हूँ। यह बड़ी बढ़िया तरकीब थी, और अगर इन्हें पता होता कि यह कितनी चतुर है, तो ये हँसते नहीं।

"मत सुनो," हंसों ने अपनी चोंच के बीच से फुसफुसाया।

पर कम्बुग्रीव से रहा नहीं गया। उसे जवाब देना ही था। उसने मुँह खोला, यह कहने के लिए, "अपने काम से काम रखो!"

वह बस "अपने..." तक ही पहुँच पाया।

नरम ज़मीन पर

वह नीचे गिरा, लुढ़कता-पलटता, डंडे से दूर।

उसकी क़िस्मत अच्छी थी कि गाँव के ठीक किनारे पर एक नरम, कीचड़ भरा तालाब था। कम्बुग्रीव एक ज़ोरदार छपाक! के साथ उसमें गिरा, और ठंडी कीचड़ में नाक तक धँस गया।

उसे चोट नहीं लगी। पर वह कीचड़ में बुरी तरह सना था, और नई झील से बहुत दूर था।

हंस नीचे उड़कर आए और उसके पास उतर गए।

"अरे, कम्बुग्रीव," विकट ने कहा, और इस बार वह हँसी नहीं।

बाक़ी रास्ता पैदल तय करने में कछुए को पूरी गर्मियाँ लग गईं, एक-एक धीमा क़दम। हंस आगे उड़ जाते और हर शाम उसका इंतज़ार करते। और उस लंबे, लंबे सफ़र में कम्बुग्रीव के पास सोचने के लिए बहुत समय था।

जब वह आख़िरकार नई झील पर पहुँचा, तो उसके दोस्तों ने पूछा कि उसने क्या सीखा।

कम्बुग्रीव मुस्कुराया। और बड़ी देर तक, उसने कुछ भी नहीं कहा।

इस कथा के बारे में

यह कहानी पंचतंत्र से है, जो प्राचीन भारत की पशु-कथाओं का संग्रह है, और यह बौद्ध जातक कथाओं में भी सुनाई जाती है। सबसे पुराने संस्करणों में गिरने का अंजाम कछुए के लिए कहीं ज़्यादा बुरा होता है। इस कोमल कथा में हमने उसे नरम ज़मीन पर उतारा है। यह संस्करण छोटा और सरल किया गया पुनर्कथन है।

Original author & credit

Retold from The Tortoise and the Geese (Panchatantra, Book I), from the Panchatantra (c. 300 BCE–300 CE), in the English translation by Arthur W. Ryder (1925). The original is in the public domain. This shortened retelling is shared for reading and awareness, and all credit for the story belongs to its original author. The same tale appears among the Buddhist Jataka tales, as the Kacchapa Jataka, where it is told to a king who talks too much.

Read the original free →

Want to read more?

For the full story and its background, try these:

  1. translated by Arthur W. Ryder, The Panchatantra. University of Chicago Press, 1925.
  2. edited by E. B. Cowell, The Jataka, or Stories of the Buddha's Former Births. Cambridge University Press, 1895.

About this story

This is a translation of the original English story. It was prepared with AI assistance and is awaiting review by a native speaker.

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