तीन छोटे सूअर
तीन छोटे सूअर अपने-अपने घर बनाने निकलते हैं, एक भूसे का, एक लकड़ियों का और एक ईंटों का। फिर एक बड़ा, बुरा भेड़िया दरवाज़ा खटखटाने आता है।
- 4 मिनट की कहानी
- Ages 4–8
- Fable & folk tale
- Traditional England
बहुत समय पहले, एक माँ सूअरनी थी, जिसके तीन छोटे सूअर बच्चे थे।
वे सब जंगल के किनारे एक आरामदायक छोटे-से घर में साथ रहते थे। पर छोटे सूअर बढ़ते गए, बढ़ते गए, बढ़ते गए, यहाँ तक कि एक दिन उनकी माँ ने कहा, "मेरे प्यारो, अब तुम काफ़ी बड़े हो गए हो। अब समय आ गया है कि तुम में से हर एक दुनिया में जाए और अपना घर ख़ुद बनाए।"
उसने उन्हें गले लगाया, और हर एक को खाने की एक पोटली दी। "अपने घर अच्छे से बनाना," उसने कहा, "और एक-दूसरे का ख़याल रखना।"
भूसे का घर
पहला छोटा सूअर सड़क पर ज़्यादा दूर नहीं गया था कि उसे भूसे का बड़ा-सा गट्ठर उठाए एक किसान मिला।
"क्या मुझे घर बनाने के लिए थोड़ा भूसा मिल सकता है?" सूअर ने पूछा। किसान ने हाँ कह दी, और पहले छोटे सूअर ने एक ही सुबह में अपना घर बना लिया।
घर थोड़ा डगमगाता था, और दीवारों में से हवा सीटी बजाती निकलती थी। पर पहले छोटे सूअर को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा।
"हो गया!" उसने कहा। "अब मैं पूरी दोपहर खेल सकता हूँ।"
लकड़ियों का घर
दूसरी छोटी सूअरनी को लकड़ियों से भरी गाड़ी लिए एक लकड़हारा मिला।
"क्या मुझे घर बनाने के लिए थोड़ी लकड़ियाँ मिल सकती हैं?" उसने पूछा। लकड़हारे ने हाँ कह दी, और दूसरी छोटी सूअरनी ने शाम की चाय तक अपना घर बना लिया।
जब वह उससे टिकती, तो वह चरमराता था, और दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं होता था। पर दूसरी छोटी सूअरनी को भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा।
"हो गया!" उसने कहा। "अब मैं आराम से लंबी झपकी ले सकती हूँ।"
ईंटों का घर
तीसरे छोटे सूअर को लाल ईंटों से भरी गाड़ी लिए एक राजमिस्त्री मिला।
"क्या मुझे घर बनाने के लिए कुछ ईंटें मिल सकती हैं?" उसने पूछा। राजमिस्त्री ने हाँ कह दी, और तीसरा छोटा सूअर काम में जुट गया।
यह धीमा, कड़ा काम था। उसने गारा मिलाया। उसने एक-एक करके ईंटें जमाईं, क़तार पर क़तार, और हर ईंट को जाँचा कि वह सीधी है। जब उसकी बहन झपकी ले रही थी, वह पूरी दोपहर काम करता रहा, और जब उसका भाई खेल रहा था, वह पूरी शाम काम करता रहा। इसमें उसे कई दिन लगे। उसकी पीठ दुखने लगी और उसके खुर छिल गए।
"तुम इतनी मेहनत क्यों कर रहे हो?" बाक़ी दोनों सूअर हँसे। "हमारे घर तो कब के बन गए!"
"क्योंकि मैं चाहता हूँ कि मेरा घर टिके," तीसरे छोटे सूअर ने कहा। और उसने छत डाली और ईंटों की एक ऊँची चिमनी बनाई, जिसके नीचे चूल्हे में खाना पकाने का एक बड़ा बर्तन रखा था।
खट, खट
कुछ ही समय बाद, जंगल से एक बड़ा, बुरा भेड़िया निकलकर आया। वह भूखा था, और उसकी नाक बहुत तेज़ थी।
उसने भूसे वाले घर का दरवाज़ा खटखटाया।
"छोटे सूअर, छोटे सूअर, मुझे अंदर आने दो!"
"हरगिज़ नहीं, मेरी ठुड्डी के बालों की क़सम!" पहले छोटे सूअर ने कहा।
"तो मैं फूँकूँगा, और फुफकारूँगा, और तुम्हारा घर उड़ा दूँगा!"
तो भेड़िये ने फूँका, और फुफकारा, और भूसे का घर सिंहपर्णी के रोएँ की तरह उड़ गया। पहला छोटा सूअर जितनी तेज़ी से उसके पैर ले जा सकते थे, भागा, सीधा अपनी बहन के लकड़ियों वाले घर तक, और उन्होंने धड़ाम से दरवाज़ा बंद कर लिया।
भेड़िया पीछे-पीछे आया। "छोटे सूअरो, छोटे सूअरो, मुझे अंदर आने दो!"
"हरगिज़ नहीं, हमारी ठुड्डी के बालों की क़सम!"
तो भेड़िये ने फूँका, और फुफकारा, और चटाक-पटाक की आवाज़ के साथ लकड़ियों का घर गिर पड़ा। दोनों छोटे सूअर भागे और भागे, सीधा अपने भाई के ईंटों वाले घर तक।
"जल्दी! अंदर आओ!" तीसरे छोटे सूअर ने कहा, और उनके पीछे दरवाज़े पर ताला लगा दिया।
फूँक और फुफकार
भेड़िया लंबे-लंबे डग भरता रास्ते पर आया।
"छोटे सूअरो, छोटे सूअरो, मुझे अंदर आने दो!"
"हरगिज़ नहीं, हमारी ठुड्डी के बालों की क़सम!"
"तो मैं फूँकूँगा, और फुफकारूँगा, और तुम्हारा घर उड़ा दूँगा!"
तो भेड़िये ने फूँका, और फुफकारा। और फूँका, और फुफकारा। और ज़ोर से फूँका, और ज़ोर से फुफकारा, यहाँ तक कि उसका चेहरा बैंगनी हो गया। पर ईंटों का घर हिला तक नहीं। एक ईंट भी नहीं।
तब भेड़िये को एक चालाक तरकीब सूझी। वह छत पर चढ़ गया और चिमनी में से कसमसाता हुआ नीचे उतरने लगा।
पर तीसरे छोटे सूअर ने उसकी आहट सुन ली थी। उसने आग में एक बड़ा लट्ठा डाल दिया, और लपटें वहाँ उबलते पानी के बर्तन के नीचे उछल पड़ीं। गरम भाप सूँ करती हुई चिमनी में ऊपर चढ़ी।
"हाय! हाय! गरम, गरम, गरम!" भेड़िया चिल्लाया। वह बोतल के ढक्कन की तरह चिमनी से उछलकर बाहर निकला, छत से कूदा और जंगल में भाग गया, और उसकी पूँछ से पीछे-पीछे धुआँ उठ रहा था।
और वह फिर कभी लौटकर नहीं आया।
साथ-साथ घर में
उस रात तीनों छोटे सूअर ईंटों वाले घर में आग के पास बैठे थे, सुरक्षित और गर्माहट में।
"माफ़ करना, हम तुम पर हँसे थे," पहले छोटे सूअर ने कहा।
"क्या तुम हमें भी ईंटों के घर बनाने में मदद करोगे?" दूसरी ने पूछा।
"बिल्कुल करूँगा," तीसरे छोटे सूअर ने कहा। "भाई-बहन होते ही इसलिए हैं।"
और उन्होंने यही किया, कंधे से कंधा मिलाकर, एक-एक ईंट करके।
इस कहानी के बारे में
यह एक पारंपरिक अंग्रेज़ी लोककथा है। इसे उन्नीसवीं सदी में जेम्स ऑर्चर्ड हैलीवेल-फ़िलिप्स ने इकट्ठा किया था, और यह 1890 में जोसेफ़ जैकब्स की English Fairy Tales से मशहूर हुई। उन पुराने संस्करणों में भेड़िया पहले दो सूअरों को पकड़ लेता है, और भेड़िये का अपना अंत भी बुरा होता है। हमारी इस कोमल कथा में सब सुरक्षित बच निकलते हैं। यह संस्करण छोटा और सरल किया गया पुनर्कथन है।