सच्चा सौदा
एक पिता अपने बेटे को बीस रुपये देकर अच्छा सौदा करने भेजता है। रास्ते में लड़के को भूखे साधुओं की एक टोली मिलती है। नौजवान गुरु नानक की यह कहानी सदियों से सिख घरों में सुनाई जाती रही है।
- 4 मिनट की कहानी
- Ages 8+
- Fable & folk tale
- Punjab, late 15th century
शाम को लड़का घर लौटा, बटुआ ख़ाली था और चेहरा शांत।
उसके पिता उसकी राह देख रहे थे। उसी सुबह उन्होंने बेटे को बीस रुपये दिए थे, जो उस ज़माने में बड़ी रक़म थी, और उसे व्यापार करने भेजा था। अब वे जानना चाहते थे कि लड़के ने कितना मुनाफ़ा कमाया।
लड़के का नाम नानक था। बरसों बाद लोग उन्हें गुरु नानक कहने वाले थे, सिखों के पहले गुरु। पर उस शाम वे बस एक बेटे थे, जिन्हें अपने पिता को जवाब देना था।
पिता की चिंता
यह कहानी जनमसाखियों से आती है, गुरु नानक के जीवन के वे पुराने वृत्तांत जिन्हें सिख सदियों से पढ़ते और सुनाते आए हैं। ये उनके जीवन के बहुत बाद लिखे गए, और एक संस्करण से दूसरे संस्करण में ब्यौरे बदल जाते हैं। आमतौर पर कहानी ऐसे सुनाई जाती है।
नानक 1400 के दशक के आख़िरी बरसों में पंजाब के तलवंडी गाँव में बड़े हुए। आज उस शहर का नाम ननकाना साहिब है, और वह पाकिस्तान में है। उनके पिता, मेहता कालू, गाँव के पटवारी थे, एक व्यावहारिक आदमी जो हिसाब-किताब बड़े ध्यान से रखते थे और चाहते थे कि बेटा दुनिया में अपनी राह बनाए।
पर नानक दूसरे लड़कों जैसे नहीं थे। उन्हें चुपचाप बैठकर सोचना अच्छा लगता था। वे घूमते-फिरते साधु-संतों के साथ समय बिताते और उनसे ईश्वर के बारे में सवाल पूछते। खेतों, मवेशियों या दुकानों में उनका मन कम ही लगता था। पिता को चिंता होती। ऐसा लड़का भला कभी रोज़ी-रोटी कैसे कमाएगा?
तो एक दिन मेहता कालू ने उनकी परीक्षा लेने की ठानी। उन्होंने नानक के हाथ में बीस रुपये रखे। मंडी वाले क़स्बे जाओ, उन्होंने कहा, और ऐसा माल ख़रीदो जिसे यहाँ लाकर बेच सको। अच्छा सौदा करना, सच्चा सौदा, ऐसा जिसमें असली मुनाफ़ा हो।
बहुत-से वृत्तांतों में, बाला नाम का एक साथी उनके साथ गया।
पेड़ों तले बैठे साधु
दोनों नौजवान सड़क पर चल पड़े। रास्ते में, चूहड़काना नाम की जगह के पास, वे एक जंगल वाले इलाक़े से गुज़रे। पेड़ों के नीचे साधुओं की एक टोली बैठी थी, ऐसे संत जिन्होंने अपना घर-बार और सारा सामान त्याग दिया था।
नानक उनसे बात करने रुक गए। जल्दी ही उन्हें दिखा कि उन लोगों ने कई दिनों से कुछ नहीं खाया था। वे दुबले और कमज़ोर थे। कुछ के पास मौसम से बचने के लिए तन पर कपड़े तक मुश्किल से थे।
नानक देर तक उन्हें देखते रहे। फिर उन्होंने अपने हाथ में रखे पैसों को देखा।
बाला ने उन्हें पिता की हिदायत याद दिलाई। पैसा व्यापार के लिए था, दान के लिए नहीं। मेहता कालू नाराज़ होंगे।
नानक ने पिता की बात पर सोचा। उनसे सच्चा सौदा करने को कहा गया था, ऐसा जिसमें असली मुनाफ़ा हो। भूखे लोगों को खाना खिलाने से सच्चा सौदा भला और क्या होगा, उन्होंने पूछा। मंडी में लगाया पैसा थोड़ा-सा और पैसा लौटा लाता। भूखों पर लगाया पैसा कुछ ऐसा लौटाता जिसे गिना नहीं जा सकता।
भोजन
तो नानक मंडी गए। पर बेचने का माल ख़रीदने के बजाय उन्होंने आटा, दाल, घी, नमक और खाने का दूसरा सामान ख़रीदा। वे सब कुछ लेकर पेड़ों के पास लौटे, और खाना पकाकर साधुओं को परोसा गया, जब तक कि हर एक ने पेट भर न खा लिया।
साधुओं ने उन्हें आशीर्वाद दिया। नानक संतोष से उनके बीच बैठे रहे। बीस रुपये ख़त्म हो चुके थे।
फिर वे और बाला घर की ओर पैदल लौट चले। कहानी कहती है कि जैसे-जैसे तलवंडी पास आया, नानक बेचैन होने लगे। उन्हें अपने किए पर कोई पछतावा नहीं था। पर वे जानते थे कि पिता यह बात नहीं समझेंगे। कुछ संस्करणों में, वे घर जाने से पहले गाँव के बाहर एक पेड़ के नीचे देर तक बैठे रहे।
ख़ाली बटुआ
जब मेहता कालू ने सारी बात सुनी, तो वे आगबबूला हो गए। बीस रुपये, अजनबियों पर लुटा दिए! कई वृत्तांतों में, ग़ुस्से में उन्होंने बेटे को मारा भी।
नानक ने न बहस की, न भागे। उन्होंने धीरे से कहा कि उन्होंने वही किया जो उनसे कहा गया था। उन्होंने सच्चा सौदा किया था।
दूसरे लोग लड़के के पक्ष में खड़े हुए। कुछ संस्करणों में यह उनकी बड़ी बहन नानकी हैं, जो उनसे बहुत प्यार करती थीं और जिन्होंने सबसे पहले उन्हें समझा। दूसरों में यह तलवंडी के ज़मींदार राय बुलार हैं, जो लड़के में पहले ही कुछ अनोखा देख चुके थे, और जिन्होंने मेहता कालू से कहा कि वे उस पर सख़्ती न करें।
वह भोजन जो कभी ख़त्म नहीं हुआ
मेहता कालू अपने बेटे को कभी पूरी तरह नहीं समझ पाए। पर उस दिन नानक ने जो सौदा किया, वह उस दिन ख़त्म नहीं हुआ।
बड़े होकर गुरु नानक ने सिखाया कि ईश्वर एक है, सब इंसान बराबर हैं, और अच्छे जीवन का मतलब है ईमानदारी की कमाई, ईश्वर को याद रखना, और जो कुछ अपने पास है उसे दूसरों के साथ बाँटना। उन्हीं की सीख से सिखों की लंगर की परंपरा निकली, मुफ़्त सामुदायिक रसोई, जहाँ कोई भी, किसी भी धर्म या पृष्ठभूमि का हो, साथ-साथ बैठकर खाना खा सकता है।
आज दुनिया भर के गुरुद्वारों में लंगर हर रोज़ बेशुमार लोगों को खाना खिलाता है। चूहड़काना के पास, जहाँ कहा जाता है कि साधुओं को भोजन कराया गया था, वहाँ एक गुरुद्वारा खड़ा है जिसका नाम है सच्चा सौदा।
इस कहानी के बारे में
सच्चे सौदे की कहानी जनमसाखियों से आती है, गुरु नानक के जीवन के पारंपरिक वृत्तांत, जो 16वीं और 17वीं सदी से लिखे जाने लगे। इनके संस्करणों में ब्यौरे अलग-अलग हैं, जैसे उस समय नानक की उम्र और यह कि उनके पक्ष में कौन खड़ा हुआ। मैक्स आर्थर मैकॉलिफ़ ने इनमें से बहुत-से वृत्तांत अंग्रेज़ी में The Sikh Religion (1909) में दोबारा लिखे। यह संस्करण एक छोटी, सरल पुनर्कथा है।