वह टीका जिसका कोई मालिक नहीं था
1955 में जोनास साल्क के पोलियो टीके को सुरक्षित और असरदार घोषित किया गया, और पूरे अमेरिका में गिरजाघरों की घंटियाँ बज उठीं। जब उनसे पूछा गया कि इसका मालिक कौन है, तो उन्होंने ऐसा जवाब दिया जो लोग आज भी याद करते हैं।
- 4 मिनट की कहानी
- Ages 10+
- Historical narrative
- 1940s–1950s
ध्यान दें: इस कहानी में एक ऐसी बीमारी का ज़िक्र है जिसने बच्चों को लकवाग्रस्त किया और उनकी जान ली, और टीके से जुड़ी एक दुर्घटना का भी।
हर गर्मी में अमेरिका के माँ-बाप डरे रहते थे।
मौसम गर्म होते ही स्विमिंग पूल बंद हो जाते। सिनेमाघर आधे ख़ाली रहते। माएँ अपने बच्चों को पार्कों और भीड़ से दूर रखतीं। किसी को ठीक-ठीक पता नहीं था कि यह बीमारी कैसे फैलती है, बस इतना कि यह गर्मियों के साथ आती है, और सबसे ज़्यादा बच्चों पर वार करती है।
यह बीमारी थी पोलियोमाइलाइटिस, या पोलियो। अक्सर इससे बुख़ार से ज़्यादा कुछ नहीं होता था। लेकिन कुछ बच्चों में यह रीढ़ की नसों पर हमला करती, और वे चल नहीं पाते। सबसे बुरे मामलों में यह साँस लेने वाली मांसपेशियों को लकवाग्रस्त कर देती, और बच्चों को "आयरन लंग" कहलाने वाली बड़ी-बड़ी मशीनों के अंदर रहना पड़ता, जो उनके लिए साँस लेती थीं। कुछ की मौत हो जाती।
1952 में, सबसे बुरे साल में, अकेले अमेरिका में लगभग 58,000 मामले हुए।
युवा डॉक्टर
जोनास साल्क का जन्म 28 अक्टूबर 1914 को न्यूयॉर्क शहर में हुआ। उनके माता-पिता यहूदी प्रवासी थे, जो ख़ुद ज़्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, पर चाहते थे कि उनके बेटों को हर मौक़ा मिले। जोनास अपने परिवार में कॉलेज जाने वाले पहले व्यक्ति थे।
उन्होंने डॉक्टरी की पढ़ाई की, लेकिन एक-एक मरीज़ का इलाज करने के बजाय कुछ और चुना। वे ऐसा शोध करना चाहते थे जिससे एक साथ बहुत-से लोगों की मदद हो सके। पहले उन्होंने इन्फ़्लुएंज़ा के टीकों पर काम किया, और 1947 में अपनी ख़ुद की प्रयोगशाला चलाने पिट्सबर्ग यूनिवर्सिटी चले गए।
पोलियो पर उनके काम का बड़ा हिस्सा एक धर्मार्थ संस्था, नेशनल फ़ाउंडेशन फ़ॉर इन्फ़ैंटाइल पैरालिसिस, के पैसे से चला। इसकी स्थापना राष्ट्रपति फ़्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट ने की थी, जिन्हें ख़ुद बड़ी उम्र में पोलियो से लकवा हुआ था। इसके चंदा अभियान को "मार्च ऑफ़ डाइम्स" कहा जाता था। लाखों आम अमेरिकियों ने एक-एक डाइम, यानी दस सेंट, भेजे।
मरा हुआ वायरस
बहुत-से वैज्ञानिक मानते थे कि लंबे समय तक बचाव सिर्फ़ ऐसे टीके से मिलेगा जो कमज़ोर किए गए, ज़िंदा वायरस से बना हो। साल्क ने अलग रास्ता चुना। उन्होंने प्रयोगशाला में पोलियो वायरस उगाया और फ़ॉर्मेल्डिहाइड नाम के एक रसायन से उसे मार दिया। उनका विचार था कि शरीर मरे हुए वायरस को पहचानना सीख लेगा और उसके ख़िलाफ़ अपना बचाव तैयार कर लेगा, बिना बीमारी लगने के किसी ख़तरे के।
वे और उनकी टीम सालों तक दिन-रात लंबे घंटे काम करते रहे। 1953 में, यह पक्का मानकर कि टीका सुरक्षित है, उन्होंने उसे ख़ुद को, अपनी पत्नी को और अपने तीन छोटे बेटों को लगाया।
बड़ा परीक्षण
1954 में इस टीके का परीक्षण हुआ, अमेरिका का अब तक का सबसे बड़ा चिकित्सा परीक्षण। लगभग 18 लाख स्कूली बच्चों ने इसमें हिस्सा लिया। कुछ को टीका दिया गया, कुछ को एक बेअसर इंजेक्शन जो बिलकुल वैसा ही दिखता था, और कुछ पर सिर्फ़ नज़र रखी गई। उन्हें "पोलियो पायनियर्स" कहा गया। हज़ारों स्वयंसेवकों, शिक्षकों और नर्सों ने मदद की।
नतीजों का लगभग एक साल तक अध्ययन एक स्वतंत्र टीम ने किया, जिसके प्रमुख डॉ. थॉमस फ़्रांसिस जूनियर थे, जो कभी साल्क के शिक्षक रह चुके थे।
12 अप्रैल 1955 को, मिशिगन यूनिवर्सिटी में, डॉ. फ़्रांसिस ने खचाखच भरे हॉल और पूरी दुनिया के सामने नतीजे घोषित किए। टीका काम कर रहा था। वह सुरक्षित था, और असरदार था।
पूरे अमेरिका में गिरजाघरों की घंटियाँ बज उठीं। दुकानों ने अपनी खिड़कियों पर तख़्तियाँ लगाईं। लोग सड़कों पर राहत के आँसू रोए। जोनास साल्क रातों-रात हीरो बन गए।
क्या आप सूरज का पेटेंट करा सकते हैं?
उस शाम मशहूर पत्रकार एडवर्ड आर. मरो ने टेलीविज़न पर साल्क का इंटरव्यू लिया। मरो ने उनसे पूछा कि टीके का पेटेंट किसके पास है।
साल्क ने जवाब दिया: "मैं तो कहूँगा, लोगों के पास। कोई पेटेंट नहीं है। क्या आप सूरज का पेटेंट करा सकते हैं?"
इतिहासकारों ने बाद में बताया है कि नेशनल फ़ाउंडेशन के वकीलों ने पेटेंट के बारे में पता किया था, और उन्हें शक था कि पेटेंट मिल भी पाता। लेकिन साल्क ने कभी टीके से मुनाफ़ा कमाने की कोशिश नहीं की, और उनके शब्द सबकी भलाई के लिए किए गए विज्ञान का प्रतीक बन गए।
एक कड़वा सबक़, और एक लंबी जीत
घोषणा के कुछ ही हफ़्तों बाद एक भयानक झटका लगा। एक कंपनी ने टीके के ऐसे बैच बना दिए थे जिनमें वायरस ठीक से मरा नहीं था। हज़ारों-हज़ार बच्चों को इससे पोलियो हो गया। ज़्यादातर मामले हल्के थे, लेकिन कुछ बच्चों को लकवा मार गया, और कुछ की मौत हो गई। सुरक्षा के नियम कड़े किए जाने तक टीकाकरण रोक दिया गया। फिर वह दोबारा शुरू हुआ, और इस बार सब ठीक रहा।
कुछ ही सालों में अमेरिका में पोलियो के मामले बहुत तेज़ी से घट गए। बाद में अल्बर्ट सेबिन का बनाया दूसरा टीका, जो मुँह से बूँदों के रूप में दिया जाता है, इस लड़ाई को पूरी दुनिया में ले गया। 2014 में भारत को, जहाँ कभी किसी भी दूसरे देश से ज़्यादा पोलियो के मामले होते थे, इस बीमारी से मुक्त घोषित किया गया।
जोनास साल्क ने आगे चलकर कैलिफ़ोर्निया में साल्क इंस्टीट्यूट फ़ॉर बायोलॉजिकल स्टडीज़ की स्थापना की। 23 जून 1995 को उनका निधन हुआ।
और पढ़ना चाहते हैं?
डेविड एम. ओशिंस्की की पुलित्ज़र पुरस्कार जीतने वाली किताब Polio: An American Story पूरा इतिहास बताती है, परीक्षण और उस झटके समेत। जेन एस. स्मिथ की Patenting the Sun का नाम साल्क के उसी मशहूर जवाब से लिया गया है।