वह गाँव जिसने बच्चों को छिपाया
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान, फ़्रांस के पहाड़ों में बसे एक ग़रीब गाँव के लोगों ने जान बचाकर भागते अजनबियों के लिए अपने दरवाज़े खोल दिए। उन्होंने हज़ारों को छिपाया, और बाद में इसके बारे में शायद ही कभी बात की।
- 4 मिनट का पाठ
- Ages 12+
- True story
- 1940s
ध्यान दें: इस कहानी में होलोकॉस्ट, गिरफ़्तारियों और एक यातना शिविर में हुई मौत का ज़िक्र है।
दस्तक अँधेरा होने के बाद हुई, जैसा अक्सर होता था।
ल शाम्बों-सुर-लिन्यों में पादरी के घर की दहलीज़ पर एक औरत बर्फ़ में काँपती खड़ी थी। वह अजनबी थी, जर्मनी से आई एक यहूदी शरणार्थी, और डरी हुई थी। उसने पूछा कि क्या वह अंदर आ सकती है।
पादरी की पत्नी, मागदा त्रोक्मे, ने दरवाज़ा पूरा खोल दिया और उससे कहा कि ठंड से निकलकर अंदर आ जाए।
बरसों बाद मागदा कहती थीं कि उन्होंने इसे कोई बड़ा फ़ैसला नहीं समझा था। कोई ठंड में था और ख़तरे में था। तो आप उसे अंदर आने देते हैं।
एक ऊँचे पठार पर बसा गाँव
ल शाम्बों-सुर-लिन्यों दक्षिण-मध्य फ़्रांस में एक ऊँचे पठार पर बसा गाँव है, जो चीड़ के जंगलों और खेतों से घिरा है। 1940 के दशक में यह ग़रीब था, साल के ज़्यादातर हिस्से ठंडा रहता था, और बड़े शहरों से दूर था।
वहाँ के ज़्यादातर लोग प्रोटेस्टेंट थे, ह्यूगनॉट्स के वंशज, जिन पर सदियों पहले फ़्रांस में उनकी आस्था के कारण ज़ुल्म हुए थे। उनके परिवारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी जंगलों में छिपने, गुप्त प्रार्थना-सभाएँ करने और सिपाहियों द्वारा खदेड़े जाने के क़िस्से चले आ रहे थे। वे अपनी रग-रग में जानते थे कि सताया जाने वाला अल्पसंख्यक होने का मतलब क्या होता है।
1940 में नाज़ी जर्मनी ने फ़्रांस को हरा दिया। उत्तर पर जर्मन सेना का क़ब्ज़ा हो गया। दक्षिण पर विशी शहर में बैठी एक फ़्रांसीसी सरकार का राज था, जो नाज़ियों के साथ सहयोग करती थी और जल्द ही यहूदियों के ख़िलाफ़ क़ानून बनाने लगी।
आत्मा के हथियार
गाँव के पादरी आंद्रे त्रोक्मे थे, एक लंबे, फुर्तीले आदमी, जो अहिंसा में गहरा विश्वास रखते थे। उनके दोस्त और साथी पादरी, एदुआर थेइस, उनके साथ काम करते थे।
जून 1940 में फ़्रांस के आत्मसमर्पण के अगले दिन, दोनों पादरियों ने एक प्रवचन दिया। उन्होंने अपनी मंडली से कहा कि ईसाइयों को उस हिंसा का विरोध करना होगा जो उनकी अंतरात्मा पर थोपी जाएगी, और वे यह विरोध बंदूक़ों से नहीं, बल्कि उन चीज़ों से करेंगे जिन्हें उन्होंने आत्मा के हथियार कहा।
तब ल शाम्बों में किसी ने अंदाज़ा भी नहीं लगाया होगा कि इसका ठीक-ठीक मतलब क्या होगा।
हर दरवाज़ा
शरणार्थी ट्रेन से, बस से और पैदल आए। कुछ अकेले आए। कुछ नक़ली काग़ज़ात लेकर आए। उनमें बहुत से यहूदी बच्चे थे, जिनके माँ-बाप गिरफ़्तार कर लिए गए थे या देश से बाहर भेज दिए गए थे। कुछ को राहत संगठनों ने वहाँ भेजा था, जो जानते थे कि यह पठार उन्हें अपना लेगा।
उन्हें किसानों ने, दुकानदारों ने, गाँव और आसपास की बस्तियों के परिवारों ने अपनाया। उन्हें अटारियों में, खलिहानों में और बोर्डिंग हाउसों में छिपाया गया। बच्चों को बाल-गृहों में रखा गया और नए नामों से स्थानीय स्कूलों में दाख़िल कराया गया। कॉलेज सेवेनॉल नाम के एक स्कूल ने बहुत से किशोरों को जगह दी।
गाँव वालों ने नक़ली पहचान-पत्र और राशन-कार्ड बनाए। जब पुलिस आने वाली होती, तो घर-घर ख़बर पहुँच जाती, और शरणार्थी चुपके से जंगल में निकल जाते, जब तक ख़तरा टल न जाए। कुछ को रास्ता दिखाने वाले पहाड़ों के पार ख़तरनाक सफ़र करवाकर तटस्थ स्विट्ज़रलैंड पहुँचाते।
किसी ने कोई सूची नहीं रखी। असल बात यही थी।
इनकार
1942 की गर्मियों में सरकार का एक मंत्री ल शाम्बों आया। छात्रों के एक समूह ने उसे एक चिट्ठी थमाई। उसमें उन्होंने लिखा था कि उन्हें पेरिस में यहूदी परिवारों की गिरफ़्तारियों के बारे में पता है, और गाँव में उनके बीच यहूदी रहते हैं। छात्रों ने लिखा कि अगर कोई उन्हें ले जाने आया, तो वे जितना हो सकेगा, उन्हें छिपाएँगे।
कुछ ही समय बाद पुलिस ल शाम्बों आई और पादरी त्रोक्मे से गाँव के यहूदियों के नाम माँगे। उन्होंने मना कर दिया। बाद के विवरणों के मुताबिक़, उन्होंने पुलिस से कहा कि उन्हें उनके नाम नहीं पता, और अगर पता भी होते, तो भी वे अपने भाइयों-बहनों को उनके हवाले नहीं करते।
पुलिस कई दिनों तक तलाशी लेती रही। उन्हें लगभग कोई नहीं मिला।
क़ीमत
गाँव ख़तरे से बचा नहीं रहा। फ़रवरी 1943 में आंद्रे त्रोक्मे, एदुआर थेइस और सरकारी स्कूल के प्रधान, रोजे दार्सिसाक, को गिरफ़्तार करके कई हफ़्तों तक एक नज़रबंदी शिविर में रखा गया। उन्हें छोड़ तो दिया गया, पर बाद में उन्हें छिपना पड़ा।
पादरी त्रोक्मे के चचेरे भाई, दानिएल त्रोक्मे, गाँव में युवा शरणार्थियों के लिए एक आश्रय-गृह चलाते थे। 1943 में गेस्टापो ने उन्हें और उनकी देखरेख में रहने वाले युवाओं को गिरफ़्तार कर लिया। 1944 में माइदानेक यातना शिविर में उनकी मौत हो गई।
फिर भी बचाने का काम युद्ध ख़त्म होने तक चलता रहा।
बाद में
कोई ठीक-ठीक नहीं जानता कि पठार पर कितने लोगों को पनाह मिली। इतिहासकारों के अनुमान आम तौर पर हज़ारों में जाते हैं, जिनमें बहुत से यहूदी बच्चे थे। वहाँ छिपाए गए लोगों में से बहुत कम कभी पकड़े गए।
जब बाद में लोगों ने गाँव वालों से पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया, तो बहुतों को यह सवाल ही अजीब लगा। उन्होंने तो बस उन लोगों की मदद की थी जिन्हें मदद की ज़रूरत थी। और करते भी क्या?
1990 में, इज़राइल के होलोकॉस्ट स्मृति केंद्र याद वाशेम ने ल शाम्बों-सुर-लिन्यों और आसपास के गाँवों के लोगों को सामूहिक रूप से "राइटियस अमंग द नेशंस" (राष्ट्रों में धर्मात्मा) के रूप में सम्मानित किया। यह उन गिने-चुने मौक़ों में से एक था जब यह सम्मान पूरे समुदाय को दिया गया।
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