यक्ष के प्रश्न
चार प्यासे भाई एक सुंदर झील का पानी पीते हैं और ज़मीन पर गिर पड़ते हैं। जब पाँचवें भाई, युधिष्ठिर, वहाँ पहुँचते हैं, तो एक आवाज़ कहती है कि वे उसके प्रश्नों के उत्तर देने के बाद ही पानी पी सकते हैं। उनकी जान, और भाइयों की जान, उनके उत्तरों पर टिकी है।
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- The Mahabharata
पाँचों पांडव भाई वनवास में वन में रह रहे थे। एक गरम दिन, पेड़ों के बीच लंबी भाग-दौड़ के बाद वे आराम करने बैठे। वे थके हुए थे और उन्हें बहुत प्यास लगी थी।
"नकुल," सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर ने कहा, "किसी पेड़ पर चढ़कर देखो कि आस-पास कहीं पानी है या नहीं।"
नकुल ऊपर चढ़े और चारों ओर देखा। "मुझे सारस दिख रहे हैं, और हरे पौधे," उन्होंने पुकारकर कहा। "पास में ज़रूर पानी होगा।"
"जाओ, हमारे लिए थोड़ा ले आओ," युधिष्ठिर ने कहा।
झील और आवाज़
नकुल को जल्द ही साफ़, चमकते पानी की एक झील मिल गई। वे किनारे पर झुके और पीने ही वाले थे कि हवा में से एक आवाज़ आई।
"दुस्साहस मत करो, बालक। यह झील मेरी है। पहले मेरे प्रश्नों के उत्तर दो, फिर पानी पियो, और जितना चाहो ले जाओ।"
नकुल को इतनी प्यास लगी थी कि उन्होंने आवाज़ पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने पानी पी लिया। और तुरंत ही वे ऐसे ज़मीन पर गिर पड़े, जैसे प्राण निकल गए हों।
जब नकुल नहीं लौटे, तो युधिष्ठिर ने सहदेव को भेजा। फिर अर्जुन को। फिर भीम को। हर एक ने वह आवाज़ सुनी। हर एक ने उसे अनसुना किया, या उससे लड़ने की कोशिश की। हर एक ने पानी पिया, और पानी के पास गिर पड़ा।
आख़िरकार युधिष्ठिर ख़ुद गए। उन्हें झील मिली, और उसके किनारे पर बेसुध पड़े अपने चारों भाई। उनका मन दुख से भर गया।
तभी उन्होंने पानी में एक चट्टान पर खड़ा एक बगुला देखा।
"मैं एक बगुला हूँ, छोटी मछलियाँ खाकर जीता हूँ," आवाज़ ने कहा। "तुम्हारे भाइयों को मैंने ही गिराया है। अगर तुमने मेरे प्रश्नों के उत्तर नहीं दिए, तो पाँचवें तुम होगे।"
युधिष्ठिर ने अपने धनुष की ओर हाथ नहीं बढ़ाया। वे दौड़कर पानी की ओर नहीं गए। उन्होंने हाथ जोड़ लिए।
"आप कौन हैं?" उन्होंने नरमी से पूछा। "कोई बगुला ऐसा कभी नहीं कर सकता।"
बगुला बदल गया। उसकी जगह एक विशाल, तेजस्वी प्राणी खड़ा था, एक यक्ष, जल की एक आत्मा, ताड़ के पेड़ जितना ऊँचा।
"मैं जितना हो सकेगा, उतने अच्छे से आपके प्रश्नों के उत्तर दूँगा," युधिष्ठिर ने कहा। "पूछिए।"
प्रश्न
यक्ष एक के बाद एक प्रश्न पूछता गया, और युधिष्ठिर शांति से हर एक का उत्तर देते गए।
यक्ष ने पूछा कि हवा से भी तेज़ क्या है। मन, युधिष्ठिर ने कहा।
उसने पूछा कि घास के तिनकों से भी ज़्यादा क्या है। हमारे विचार, युधिष्ठिर ने कहा।
उसने पूछा कि धरती से भी भारी क्या है। माँ, युधिष्ठिर ने कहा। और आकाश से भी ऊँचा क्या है? पिता।
उसने पूछा कि सबसे बड़ा लाभ क्या है। अच्छा स्वास्थ्य। सबसे अच्छा सुख क्या है? संतोष।
उसने पूछा कि घर से दूर किसी यात्री का मित्र कौन है। साथी, युधिष्ठिर ने उत्तर दिया। और बीमार का मित्र कौन है? वैद्य।
फिर यक्ष ने अपना सबसे कठिन प्रश्न पूछा। दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?
युधिष्ठिर ने एक पल सोचा। हर दिन, उन्होंने कहा, लोग दूसरों को इस दुनिया से जाते देखते हैं। फिर भी जो बचे रहते हैं, वे ऐसे जीते हैं जैसे वे हमेशा जीवित रहेंगे। इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है?
एक भाई
यक्ष प्रसन्न हुआ।
"तुमने अच्छे उत्तर दिए हैं," उसने कहा। "बदले में तुम्हारा एक भाई जीवित हो सकता है। चुनो, कौन-सा।"
युधिष्ठिर ने किनारे पर पड़े अपने भाइयों को देखा। भीम, सबसे बलवान। अर्जुन, सबसे बड़े धनुर्धर। इनमें से कोई भी उनकी सेना को शक्तिशाली बना देता।
"नकुल जीवित हो जाएँ," उन्होंने कहा।
यक्ष हैरान हुआ। "नकुल क्यों? भीम और अर्जुन तुम्हारे सगे भाई हैं, और सबसे बलवान। नकुल तो बस तुम्हारे सौतेले भाई हैं।"
"मेरे पिता की दो पत्नियाँ थीं," युधिष्ठिर ने कहा, "कुंती और माद्री। मैं कुंती का पुत्र हूँ, और मैं जीवित हूँ। माद्री का भी एक पुत्र जीवित हो जाए, ताकि दोनों माताओं का एक-एक पुत्र रहे।"
पुरस्कार
यह सुनकर यक्ष बहुत प्रसन्न हुआ।
"क्योंकि तुम ताक़त से ऊपर न्याय और दया को मानते हो," उसने कहा, "तुम्हारे सभी भाई जीवित हो जाएँ!"
और एक-एक करके चारों भाई उठ बैठे, जैसे नींद से जागे हों, फिर से स्वस्थ और बलवान।
तब यक्ष ने बताया कि वह असल में कौन था। वह स्वयं धर्मराज थे, धर्म और न्याय के देवता, और युधिष्ठिर के अपने पिता। वे अपने पुत्र की परीक्षा लेने आए थे। और उनका पुत्र परीक्षा में खरा उतरा था।
इस कहानी के बारे में
यह प्रसिद्ध प्रसंग, जिसे संस्कृत में यक्ष प्रश्न कहते हैं, महाभारत के वन पर्व से है। मूल कथा में यहाँ बताए गए प्रश्नों और उत्तरों से कहीं ज़्यादा हैं। भारत में लोग आज भी युधिष्ठिर के उत्तर दोहराते हैं। यह संस्करण छोटा और सरल किया गया पुनर्कथन है।