पीले फ़ोन बूथ
1980 के दशक की शुरुआत में ज़्यादातर भारतीयों ने कभी टेलीफ़ोन इस्तेमाल नहीं किया था, और परिवार एक कनेक्शन के लिए बरसों इंतज़ार करते थे। अमेरिका में अपनी क़िस्मत बना चुका एक बढ़ई का बेटा इसे बदलने घर लौटा, और जवाब निकला एक छोटा-सा पीला बोर्ड।
- 4 मिनट की कहानी
- Ages 13+
- Biography
- 1940s–2000s
1990 के दशक की शुरुआत के किसी छोटे भारतीय शहर की कल्पना कीजिए। एक व्यस्त नुक्कड़ पर, चाय की दुकान और कपड़े की दुकान के बीच, काँच के दरवाज़े वाला एक पतला-सा बूथ है, जिस पर चटक पीला बोर्ड लगा है। बोर्ड पर तीन छोटे शब्द लिखे हैं: STD, ISD, PCO।
अंदर एक टेलीफ़ोन रखा है और एक छोटा मीटर, जो हर कॉल का ख़र्च गिनता है। बाहर एक नौजवान अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा है, ताकि दो सौ किलोमीटर दूर गाँव में अपनी माँ को फ़ोन कर सके। उसके पीछे एक व्यापारी खड़ा है, जिसे दूसरे शहर में अपने सप्लायर को फ़ोन करना है।
कुछ साल पहले, इन दोनों में से कोई भी यह कॉल कर ही नहीं सकता था।
बिना फ़ोन का एक देश
1980 के दशक की शुरुआत में, भारत में क़रीब सत्तर करोड़ लोगों के लिए बस बीस-पच्चीस लाख टेलीफ़ोन थे। उनमें से ज़्यादातर कुछ बड़े शहरों में थे। गाँवों के बड़े हिस्से में मीलों तक कोई टेलीफ़ोन नहीं था।
कनेक्शन मिलने में बरसों लग सकते थे। परिवार वेटिंग लिस्ट में अपना नाम लिखवाते और इंतज़ार करते। जब लाइन आती भी, तो अक्सर बंद पड़ जाती। बहुत से लोग टेलीफ़ोन को अमीरों की चीज़ मानते थे, ऐसी चीज़ नहीं जिसकी भारत को ज़रूरत हो, जब उसके सामने सुलझाने को इतनी सारी दूसरी मुश्किलें थीं।
एक आदमी को लगता था कि बात ठीक इसकी उल्टी है।
बढ़ई का बेटा
सत्यनारायण गंगाराम पित्रोदा, जिन्हें दुनिया सैम के नाम से जानती है, 1942 में ओडिशा के एक छोटे-से क़स्बे टिटलागढ़ में पैदा हुए। उनका परिवार गुजराती था, और उनके पिता बढ़ई थे। घर में न बिजली थी, न टेलीफ़ोन।
उन्होंने बड़ौदा की महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी से भौतिकी पढ़ी, और 1964 में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग पढ़ने अमेरिका के शिकागो चले गए। वे वहीं रह गए, और आविष्कारक बन गए। उन्होंने उन डिजिटल स्विचों पर काम किया जो टेलीफ़ोन कॉल जोड़ते हैं, बहुत से पेटेंट लिए, और अपनी कंपनी शुरू की, जिसे उन्होंने बड़ी रक़म में बेचा।
चालीस साल के होने से पहले ही वे अमीर हो चुके थे और अमेरिका में बस चुके थे। लेकिन, जैसा वे अपनी आत्मकथा में बताते हैं, 1980 के आसपास दिल्ली की एक यात्रा ने सब कुछ बदल दिया। उन्होंने अपने होटल से शिकागो में पत्नी और परिवार को फ़ोन करने की कोशिश की, और फ़ोन लगा ही नहीं। इससे उनके मन में सवाल उठा कि टेलीफ़ोन भारत के लिए क्या कर सकता है, और इतने कम भारतीयों के पास यह क्यों है।
घर में ही बनाना
पित्रोदा का मानना था कि भारत को विदेश से बस महँगे उपकरण नहीं ख़रीदने चाहिए। उसे अपने ख़ुद के उपकरण डिज़ाइन करने चाहिए, जो भारतीय हालात के लिए बने हों: गर्मी, धूल, आती-जाती बिजली, और किसी भी मरम्मत की दुकान से दूर बसे छोटे क़स्बे।
वे अपने विचार प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पास ले गए, और बाद में उनके बेटे और उत्तराधिकारी राजीव गांधी के साथ क़रीब से काम किया। 1984 में सरकार ने भारतीय टेलीफ़ोन एक्सचेंज बनाने के लिए सेंटर फ़ॉर डेवलपमेंट ऑफ़ टेलीमैटिक्स, यानी सी-डॉट, बनाया। पित्रोदा ने इसकी अगुवाई की। व्यापक रूप से बताया जाता है कि उन्होंने साल का बस एक रुपया वेतन लिया।
उन्होंने युवा भारतीय इंजीनियरों की एक टीम जुटाई, जिनमें से बहुत से कॉलेज से निकले ही थे, और उन्हें एक डेडलाइन और एक तय बजट दिया। वे उधार के दफ़्तरों में देर-देर तक काम करते रहे। कुछ ही सालों में उन्होंने ऐसे छोटे डिजिटल एक्सचेंज डिज़ाइन कर लिए जो किसी गाँव में बिना एयर-कंडीशनिंग के चल सकते थे, और क़स्बों और शहरों के लिए बड़े एक्सचेंज भी। फिर ये डिज़ाइन भारतीय कंपनियों ने बनाए और पूरे देश में फैल गए।
पीला बोर्ड
अकेले एक्सचेंज काफ़ी नहीं थे। ज़्यादातर परिवार अब भी अपना फ़ोन नहीं ले सकते थे।
इसलिए पब्लिक कॉल ऑफ़िस, यानी पीसीओ, का विचार सबके लिए खोल दिया गया। किसी सरकारी काउंटर की जगह, दुकान की थोड़ी-सी जगह रखने वाला कोई भी आदमी फ़ोन बूथ चलाने की अर्ज़ी दे सकता था, जिसमें फ़ोन पर एक मीटर लगा होता। फ़ोन करने वाले सिर्फ़ उतनी कॉल का पैसा देते जितनी वे करते। STD का मतलब था भारत के अंदर लंबी दूरी की कॉल, और ISD का मतलब विदेश की कॉल।
शुरुआत के बहुत से बूथ उन लोगों को दिए गए जिन्हें काम की ज़रूरत थी: बेरोज़गार नौजवानों को और विकलांग लोगों को। 1980 के दशक के आख़िर और 1990 के दशक में बूथ हाईवे के किनारे, बाज़ार के चौकों में, रेलवे स्टेशनों पर और छोटे क़स्बों में फैलते गए, यहाँ तक कि उनकी गिनती लाखों में पहुँच गई। पीला बोर्ड भारतीय सड़क का हिस्सा बन गया।
लाखों परिवारों के लिए वह बूथ ही उनका पहला टेलीफ़ोन था। एक फ़ौजी की पत्नी उसकी आवाज़ सुन सकती थी। घर से दूर पढ़ने वाला छात्र नतीजे के दिन फ़ोन कर सकता था। एक किसान अपनी गाड़ी लादने से पहले क़स्बे की मंडी में अपनी फ़सल का भाव पूछ सकता था।
बूथों के बाद
पित्रोदा ने आगे चलकर पीने के पानी, साक्षरता, टीकाकरण और दूरसंचार के लिए राष्ट्रीय मिशनों पर राजीव गांधी को सलाह दी, और सरकार के दूरसंचार आयोग की अगुवाई की। बरसों बाद वे भारत के राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के अध्यक्ष बने।
आज पीले बूथ लगभग ग़ायब हो चुके हैं। ज़्यादातर भारतीय अब जेब में फ़ोन रखते हैं, और बहुत से नौजवानों ने कभी पीसीओ देखा ही नहीं।
लेकिन बूथों ने अपना काम कर दिया। उन्होंने गाँवों के एक देश को सिखाया कि टेलीफ़ोन सबका है, और उस नेटवर्क को बनाने में मदद की जिस पर मोबाइल का ज़माना आया।
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सैम पित्रोदा की आत्मकथा Dreaming Big टिटलागढ़ से शिकागो और फिर दिल्ली तक की उनकी अपनी कहानी कहती है। सी-डॉट की वेबसाइट, जो आज भी भारतीय टेलीकॉम तकनीक पर काम करता है, उसका इतिहास बताती है।