यह भी गुज़र जाएगा
फ़ारस का एक बादशाह अपने विद्वानों से ऐसे शब्द माँगता है जो उसे दुख में ख़ुश कर दें, और ख़ुशी में संभाल दें। जवाब एक बूढ़े आदमी से मिलता है, एक सादी अँगूठी पर खुदा हुआ।
- 4 मिनट की कहानी
- Ages 12+
- Fable & folk tale
- Traditional Persia
बादशाह के पास वह सब कुछ था जो किसी बादशाह को चाहिए हो सकता है, और फिर भी उसे नींद नहीं आती थी।
उसका महल गुलाबों और बहते पानी वाले बाग़ों के बीच खड़ा था। उसका ख़ज़ाना भरा था। उसकी फ़ौजों ने याद में आने वाली हर लड़ाई जीती थी। और फिर भी, रात-दर-रात, वह अपने शयनकक्ष की नक़्क़ाशीदार छत के नीचे जागता पड़ा रहता, करवटें बदलता रहता।
जब हालात अच्छे होते, तो वह इतना ख़ुश होता कि उसे सब कुछ खो देने का डर सताने लगता। जब हालात बुरे होते, तो वह इतना दुखी होता कि उसे यक़ीन ही न होता कि कभी फिर अच्छे होंगे। वह इन दोनों के बीच ऐसे झूलता रहता जैसे हवा में कोई दीया।
बादशाह का सवाल
एक सुबह उसने अपने सारे विद्वानों को बड़े दरबार में बुलाया।
वहाँ लंबी सफ़ेद दाढ़ियों वाले आलिम थे, सितारों के नक़्शे लिए ज्योतिषी थे, शायर थे, क़ाज़ी थे और हकीम थे। उन्होंने झुककर सलाम किया और इंतज़ार करने लगे।
"मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे लिए कुछ ढूँढो," बादशाह ने कहा। "कुछ शब्द। ऐसे शब्द जो मुझे दुख में ख़ुश कर दें, और जब मैं ज़रूरत से ज़्यादा ख़ुश होऊँ, तो मुझे दोबारा सोचने पर मजबूर कर दें। ऐसे शब्द जो मेरी ज़िंदगी के हर पल में सच हों, चाहे कुछ भी हो। उन्हें एक अँगूठी पर खुदवा दो, ताकि मैं उन्हें हमेशा अपने साथ रख सकूँ।"
विद्वानों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा। फिर वे झुके और सोचने चले गए।
तलाश के दिन
वे कई दिन तक ढूँढते रहे। उन्होंने शाही पुस्तकालय की बड़ी-बड़ी किताबें छान मारीं। वे दीयों और चाय के प्यालों के बीच देर रात तक बहस करते रहे। उन्होंने सैकड़ों कहावतें लिखीं, और फिर उन्हें काट दिया।
जो कविता किसी दुखी आदमी को ढाढ़स बँधाती, वह किसी ख़ुश आदमी को खोखली लगती। जो चेतावनी किसी घमंडी को विनम्र बनाती, वह पहले से निराश आदमी को कुचल देती। कुछ भी हर पल में सच नहीं था। कुछ भी दोनों पर ठीक नहीं बैठता था।
आख़िरकार, थक-हारकर, उनमें से एक शहर के किनारे अकेले रहने वाले एक बूढ़े दरवेश से मिलने गया। वह ग़रीब आदमी था, जिसके पास अपने चोगे और कटोरे से ज़्यादा कुछ नहीं था, पर लोग कहते थे कि उसकी नज़र साफ़ है।
दरवेश ने पूरी उलझन सुनी। फिर वह मुस्कुराया, और थोड़ा समय माँगा।
सादी अँगूठी
कुछ दिन बाद दरवेश महल आया।
वह कोई ख़र्रा या किताब नहीं लाया था। वह कपड़े की एक छोटी-सी पोटली लाया था, जिसे उसने बादशाह के सामने खोला। उसके अंदर एक अँगूठी थी। वह सोने की नहीं थी, और उसमें कोई नगीना नहीं था। वह सादी धातु का एक सीधा-सादा छल्ला थी।
"ये रहे आपके शब्द, जहाँपनाह," दरवेश ने कहा। "पर मेरी एक गुज़ारिश है। इन्हें अभी मत पढ़िए। इन्हें तभी पढ़िए जब आप बड़ी मुसीबत में हों, या बड़ी ख़ुशी में।"
बादशाह की भौंहें तन गईं। उसे इंतज़ार करने को कहे जाने की आदत नहीं थी। पर बूढ़े आदमी के चेहरे में कुछ ऐसा था कि वह मान गया। उसने अँगूठी उँगली में पहन ली, और दरवेश घर चला गया।
सबसे अँधेरा दिन
कुछ ही समय बाद, जंग आ गई।
एक दुश्मन फ़ौज ने सरहद पार की, इतनी बड़ी जितनी बादशाह ने पहले कभी नहीं देखी थी। उसके सेनापति हार गए। उसके शहर एक के बाद एक गिरते गए। आख़िर में ख़ुद बादशाह को अपनी ही राजधानी से भागना पड़ा, मुट्ठी भर वफ़ादार साथियों के साथ रात भर घोड़ा दौड़ाते हुए, और दुश्मन के घुड़सवार पीछे लगे थे।
वे पहाड़ों में घुसते चले गए, जब तक कि घोड़े और आगे न जा सके। बादशाह एक चट्टान के किनारे पत्थरों के बीच छिप गया, तन के कपड़ों के सिवा उसके पास कुछ नहीं था। नीचे से उसे रास्ते पर ऊपर आती टापों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
उसने अपना महल, अपनी सल्तनत और अपना सब कुछ खो दिया था। उसने ख़ुद को इतना अकेला पहले कभी महसूस नहीं किया था।
तभी उसे अँगूठी याद आई।
उसने उसे उँगली पर घुमाया, और पहली बार पढ़ा कि दरवेश ने उसके भीतर क्या खुदवाया था। वह बहुत छोटा-सा था।
यह भी गुज़र जाएगा।
बादशाह बिल्कुल स्थिर बैठा रहा। फिर उसने धीरे से साँस छोड़ी। टापें और पास आईं, और फिर, रास्ते के नीचे, वे एक दूसरी पगडंडी की ओर मुड़ गईं, और रात में खो गईं।
सबसे ख़ुशी का दिन
अगले कुछ महीनों में बादशाह ने अपने बिखरे सिपाहियों को इकट्ठा किया। जो दोस्त उसे खोया हुआ समझ बैठे थे, वे उसके साथ आ खड़े हुए। धीरे-धीरे उसने अपने शहर वापस जीते, और आख़िरकार अपनी फ़ौज के आगे-आगे अपनी राजधानी में लौटा।
गलियाँ जयजयकार करते लोगों से भरी थीं। हर छत से फूल बरसाए जा रहे थे। ढोल और तुरहियाँ बज रही थीं, और पूरा शहर नाच रहा था। यह बादशाह की ज़िंदगी का सबसे बड़ा दिन था, और उसका दिल गर्व से फूल उठा।
तभी, फाटक से गुज़रते हुए, उसे उँगली पर वह सादी अँगूठी महसूस हुई। उसने नीचे उसकी तरफ़ देखा, और उसे याद आया।
यह भी गुज़र जाएगा।
उसका गर्व उतर गया। ख़ुशी नहीं, बस गर्व। उसने जयजयकार करती भीड़ को देखा, और उनके बीच अब भी खड़े टूटे घरों को, और वह समझ गया कि यह दिन भी ख़त्म होगा, और असल बात यह है कि वह इस दिन के साथ क्या करता है।
कहते हैं कि उसके बाद उसने ज़्यादा नरमी से राज किया। और यह कि अपनी बाक़ी ज़िंदगी में उसने वह अँगूठी एक बार भी नहीं उतारी।
इस कहानी के बारे में
यह कथा फ़ारसी बोलने वाली दुनिया में और सूफ़ी परंपरा में सुनाई जाती है, और यहूदी लोककथाओं में यह राजा सुलेमान के बारे में कही जाती है। उन्नीसवीं सदी में यह वाक्य अंग्रेज़ी में मशहूर हुआ, और अब्राहम लिंकन ने 1859 में एक भाषण में यह कहानी सुनाई। हर सुनाने वाले के साथ ब्योरे बदल जाते हैं, पर अँगूठी के शब्द कभी नहीं बदलते। यह संस्करण छोटा और सरल किया गया पुनर्कथन है।