सत्ताईस साल
नेल्सन मंडेला ने रंगभेद का विरोध करने के लिए सत्ताईस साल जेल में बिताए। जब वे बाहर आए, तो बदला लेने नहीं, बल्कि सबके लिए एक देश बनाने के इरादे के साथ।
- 4 मिनट का पाठ
- Ages 12+
- Biography
- 1910s–2010s
ध्यान दें: इस कहानी में नस्ली अन्याय, कैद और राजनीतिक हिंसा का ज़िक्र है।
नेल्सन रोलिहलाहला मंडेला का जन्म 1918 में दक्षिण अफ़्रीका के ईस्टर्न केप में म्वेज़ो गाँव में हुआ था। उनके पिता थेम्बू लोगों के एक मुखिया के सलाहकार थे। उनके पहले नाम, रोलिहलाहला, का अनुवाद अक्सर "मुसीबत खड़ी करने वाला" किया जाता है। स्कूल में एक शिक्षक ने उन्हें अंग्रेज़ी नाम नेल्सन दिया।
वे मवेशी चराते हुए बड़े हुए, शाही दरबार में बुज़ुर्गों को झगड़े सुलझाते सुनते हुए, और यह सीखते हुए कि एक अच्छा नेता पहले सुनता है और आख़िर में बोलता है।
रंगभेद
उस समय दक्षिण अफ़्रीका पर वहाँ के गोरे अल्पसंख्यकों का शासन था। 1948 से सरकार ने अपार्टहाइड नाम की एक व्यवस्था लागू की, जिसका मतलब है "अलगाव"। क़ानून के तहत अश्वेत, भारतीय और मिश्रित नस्ल के दक्षिण अफ़्रीकियों को गोरे दक्षिण अफ़्रीकियों से अलग रखा जाता था और उनके साथ दोयम दर्जे के नागरिकों जैसा बर्ताव होता था। वे वोट नहीं दे सकते थे। उन्हें पास साथ रखने पड़ते थे। उन्हें कुछ तय इलाक़ों में रहने, अलग और कमतर स्कूलों में पढ़ने, और अलग अस्पताल, बसें और समुद्र-तट इस्तेमाल करने पर मजबूर किया जाता था।
मंडेला ने क़ानून की पढ़ाई की और अपने दोस्त ओलिवर टैम्बो के साथ मिलकर जोहानिसबर्ग में दक्षिण अफ़्रीका की पहली ऐसी क़ानूनी फ़र्म खोली जिसे अश्वेत लोग चलाते थे। वे अफ़्रीकन नेशनल कांग्रेस, यानी एएनसी, में शामिल हो गए, जो रंगभेद के ख़िलाफ़ अभियान चला रही थी।
शुरू में एएनसी ने शांतिपूर्ण विरोध का रास्ता अपनाया। लेकिन 1960 में शार्पविल में पुलिस ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोली चला दी, जिसमें 69 लोग मारे गए। सरकार ने एएनसी पर प्रतिबंध लगा दिया। मंडेला और दूसरों ने तय किया कि अब अकेले शांतिपूर्ण विरोध काफ़ी नहीं है, और उन्होंने एक सशस्त्र शाखा बनाने में मदद की, जो सरकारी ठिकानों पर तोड़-फोड़ की कार्रवाई करे।
जेल
मंडेला को 1962 में गिरफ़्तार किया गया। 1964 में, उस मुक़दमे के अंत में जिसे रिवोनिया ट्रायल के नाम से जाना गया, उन्हें और कई दूसरे लोगों को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई।
उन्हें रॉबेन आइलैंड भेज दिया गया, जो केप टाउन के तट से दूर तेज़ हवाओं से घिरे एक द्वीप पर बनी जेल थी। उन्होंने वहाँ अठारह साल बिताए। उनकी कोठरी बहुत छोटी थी, लगभग दो मीटर गुणा ढाई मीटर। वे फ़र्श पर एक चटाई पर सोते थे। दिन में उन्हें और दूसरे क़ैदियों को एक खदान में पत्थर तोड़ने और चूना खोदने पर मजबूर किया जाता था, जहाँ सफ़ेद पत्थर की चकाचौंध से उनकी आँखें ख़राब हो गईं।
शुरू में उन्हें हर छह महीने में सिर्फ़ एक मुलाक़ाती और एक चिट्ठी की इजाज़त थी। जब उनकी माँ का देहांत हुआ, और फिर उनके सबसे बड़े बेटे की एक कार दुर्घटना में मौत हुई, तो उन्हें उनके अंतिम संस्कार में जाने की इजाज़त नहीं दी गई।
दीवारों के भीतर
फिर भी मंडेला ने जेल में अपने समय का इस्तेमाल किया। उन्होंने पढ़ाई की। उन्होंने अफ़्रीकान्स सीखी, जो उनके ज़्यादातर जेलरों की भाषा थी, और उनका इतिहास पढ़ा, ताकि उन्हें समझ सकें। वे पहरेदारों के साथ गरिमा और शिष्टता से पेश आते थे, और बरसों में उनमें से कुछ उनका गहरा सम्मान करने लगे।
क़ैदियों ने एक-दूसरे के लिए कक्षाएँ आयोजित कीं, यहाँ तक कि रॉबेन आइलैंड "यूनिवर्सिटी" के नाम से जाना जाने लगा। बाहर, मंडेला का नाम पूरी दुनिया में एक प्रतीक बन गया। लोगों ने उनकी रिहाई के लिए जुलूस निकाले, गीत गाए और अभियान चलाए। कई देशों ने दक्षिण अफ़्रीका पर प्रतिबंध लगाए।
1982 में उन्हें मुख्य भूमि की एक जेल में भेज दिया गया, और 1980 के दशक के आख़िर में सरकार ने चुपके से उनसे बातचीत शुरू की।
आज़ाद
11 फ़रवरी 1990 को, सत्ताईस साल जेल में बिताने के बाद, नेल्सन मंडेला अपनी पत्नी विनी का हाथ थामे और मुट्ठी ऊपर उठाए विक्टर वर्स्टर जेल के फाटकों से बाहर निकले। वे इकहत्तर साल के थे। यह पल पूरी दुनिया में सीधा प्रसारित हुआ।
बहुत-से लोगों को डर था कि दक्षिण अफ़्रीका में गृहयुद्ध भड़क उठेगा। उसके बाद के बरसों में भयानक हिंसा हुई। लेकिन मंडेला ने गोरे राष्ट्रपति एफ़. डब्ल्यू. डी क्लर्क के साथ मिलकर बातचीत के ज़रिए रंगभेद का अंत करवाने का काम किया। 1993 में दोनों को संयुक्त रूप से नोबेल शांति पुरस्कार मिला।
राष्ट्रपति
अप्रैल 1994 में दक्षिण अफ़्रीका में पहला ऐसा चुनाव हुआ जिसमें हर नस्ल के लोग वोट दे सकते थे। लाखों लोग अपनी ज़िंदगी में पहली बार वोट देने के लिए घंटों क़तारों में खड़े रहे।
नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ़्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने।
उन्होंने अपने शपथ-ग्रहण समारोह में अपने एक पुराने जेलर को बुलाया। उन्होंने सत्य और सुलह आयोग (ट्रुथ एंड रिकंसिलिएशन कमीशन) बनाया, जहाँ पीड़ित बता सकते थे कि उनके साथ क्या हुआ था, और जिन्होंने अपराध किए थे, वे उन्हें क़बूल करके आम माफ़ी की अर्ज़ी दे सकते थे। उन्होंने एक "इंद्रधनुषी राष्ट्र" की बात की, जहाँ हर पृष्ठभूमि के लोग अपनापन महसूस करें।
हरी जर्सी
सबसे मशहूर पलों में से एक 1995 में आया। दक्षिण अफ़्रीका ने रग्बी वर्ल्ड कप की मेज़बानी की। बहुत-से अश्वेत दक्षिण अफ़्रीकियों के लिए राष्ट्रीय रग्बी टीम, स्प्रिंगबॉक्स, रंगभेद का प्रतीक थी, और उसकी हरी-सुनहरी जर्सी से लोग नफ़रत करते थे।
मंडेला ने फिर भी टीम का साथ देने का फ़ैसला किया। जब दक्षिण अफ़्रीका ने फ़ाइनल जीता, तो वे स्प्रिंगबॉक की जर्सी और टोपी पहनकर मैदान पर आए, ताकि गोरे कप्तान फ़्रांस्वा पिनार को ट्रॉफ़ी सौंप सकें। ज़्यादातर गोरे दर्शकों से भरी साठ हज़ार लोगों की भीड़ उनका नाम पुकारने लगी।
बहुत-से लोगों के लिए यही वह पल था, जब देश को यक़ीन होने लगा कि वह एक राष्ट्र बन सकता है।
उसके बाद
मंडेला सिर्फ़ एक कार्यकाल तक राष्ट्रपति रहे और 1999 में पद छोड़ दिया। अपने बाद के बरस उन्होंने बच्चों के लिए और शिक्षा के लिए अभियान चलाने में बिताए, और अपने बेटे की इसी बीमारी से मौत के बाद एचआईवी/एड्स के ख़िलाफ़ भी।
2013 में, पंचानबे साल की उम्र में, उनका निधन हो गया। उनका जन्मदिन, 18 जुलाई, संयुक्त राष्ट्र नेल्सन मंडेला अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाता है।
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मंडेला की आत्मकथा, Long Walk to Freedom, बीसवीं सदी की महान जीवन-कथाओं में से एक है। जॉन कार्लिन की Playing the Enemy 1995 के रग्बी वर्ल्ड कप की कहानी विस्तार से बताती है, और इसी से फ़िल्म Invictus प्रेरित हुई थी।