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Kindness

दो बूढ़े

दो पुराने दोस्त यरूशलम की लंबी तीर्थयात्रा पर पैदल निकलते हैं। उनमें से सिर्फ़ एक वहाँ पहुँचता है। ईश्वर से किया वादा सच में निभाने का मतलब क्या है, इस पर टॉल्स्टॉय की कहानी।

  • 5 मिनट का पाठ
  • Ages 10+
  • Classic retold
  • 1880s
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दो बूढ़ों ने बरसों पहले एक-दूसरे से वादा किया था कि एक दिन वे साथ-साथ पैदल यरूशलम जाएँगे।

एफ़ीम एक खाता-पीता किसान था, गंभीर और सधा हुआ। वह न कभी शराब पीता, न कभी गाली देता, और न कभी एक कोपेक भी बर्बाद करता। एलीशा न अमीर था, न ग़रीब। वह एक हँसमुख, छोटे क़द का आदमी था, जो मधुमक्खियाँ पालता था, चुटकी भर नसवार का शौक़ रखता था, काम करते हुए गाता रहता था और सबसे उसकी बनती थी।

बरसों तक यात्रा टलती रही। एफ़ीम के पास हमेशा पहले निपटाने को कोई न कोई काम होता। पर आख़िरकार, एक बसंत में, जब बुआई हो चुकी, दोनों दोस्तों ने अपने पैसे बटुओं में रखे, अपने परिवारों से विदा ली, और पैदल चल पड़े।

दक्षिण की राह

वे पाँच हफ़्ते चलते रहे। एफ़ीम सारे रास्ते चिंता करता रहा। उसे बार-बार अपने खेत और अपने बेटे का ख़याल आता, कि घर पर सब काम ठीक से हो रहा है या नहीं। वह बार-बार अपनी कमीज़ के नीचे छिपी पैसों की थैली टटोलता रहता।

एलीशा को कोई चिंता नहीं थी। वह गुनगुनाता हुआ चलता, रास्ते में लोगों से बतियाता, और जहाँ कहीं मधुमक्खियाँ पाली गई होतीं, वहाँ एक नज़र देखने के लिए ज़रूर रुकता।

आख़िर वे एक ऐसे इलाक़े में पहुँचे जहाँ फ़सल मारी गई थी। लोग भूखे थे। बहुतों ने बस रोटी ख़रीदने के लिए अपना सब कुछ बेच दिया था, अपनी गायें और घोड़े तक।

एक गरम दोपहर एलीशा को प्यास लगी। "तुम चलते रहो," उसने एफ़ीम से कहा। "मैं ज़रा उस झोंपड़ी में पानी पीने जाता हूँ, फिर तुम्हें पकड़ लूँगा।"

झोंपड़ी

एलीशा ने दरवाज़ा खोला और ठिठक गया।

एक आदमी दीवार से टिका पड़ा था, दुबला और पीला, इतना कमज़ोर कि उठ भी न सके। एक औरत फ़र्श पर पड़ी कराह रही थी। एक बूढ़ी औरत चूल्हे के ऊपर लेटी थी, और उसके पास एक छोटा लड़का बैठा रोटी के लिए रो रहा था। एक नन्ही लड़की फ़र्श पर रेंग रही थी, इतनी कमज़ोर कि रो भी नहीं पा रही थी। पूरा परिवार भूख और बीमारी से मर रहा था।

एलीशा ने अपना थैला नीचे रखा। उसमें से एक रोटी निकाली, तोड़ी और सबको बाँट दी। वह कुएँ से पानी लाया। उसने चूल्हा जलाया और शोरबा बनाया। वह गाँव में गया और आटा, नमक और तेल ख़रीद लाया, और रोटी पकाई।

वह रात वहीं रुका। अगले दिन भी रुका। धीरे-धीरे परिवार में जान लौटने लगी। और एलीशा को उनकी कहानी पता चली। एक बुरा साल आया था। उन्होंने अपना सब कुछ बेच दिया था, उधार भी लिया था, फिर भी पूरा नहीं पड़ा। उन्होंने अपना खेत तक एक अमीर पड़ोसी के पास गिरवी रख दिया था। अब उनके पास बोने को बीज नहीं था, और काटने को कुछ नहीं।

एलीशा का फ़ैसला

तीसरे दिन एलीशा ने ख़ुद से कहा, मुझे आगे जाना चाहिए। एफ़ीम इंतज़ार कर रहा है।

पर फिर उसने सोचा कि उसके जाने के बाद क्या होगा। जो खाना उसने ख़रीदा था, वह ख़त्म हो जाएगा। खेत के बिना वे कुछ उगा नहीं सकते थे, और गाय के बिना बच्चों के लिए दूध नहीं होगा। वे फिर वहीं पहुँच जाएँगे जहाँ से शुरू हुए थे।

उसने अपनी यात्रा के बारे में सोचा। अगर मैं ईश्वर को ढूँढ़ने यरूशलम चला जाऊँ, उसने सोचा, और इन लोगों को इसी हाल में छोड़ दूँ, तो हो सकता है मैं उस ईश्वर को खो दूँ जो मेरे भीतर है।

तो वह रुक गया। उसने उनका खेत छुड़ा दिया। उसने उन्हें एक गाय ख़रीद दी, एक घोड़ा और गाड़ी, और इतना आटा कि फ़सल आने तक चल जाए। परिवार रोने लगा और उसे संत कहने लगा, और नन्ही लड़की उसका हाथ छोड़ ही नहीं रही थी।

फिर एक सुबह तड़के, किसी के जागने से पहले, वह चुपचाप खिसक गया।

रास्ते में जब उसने अपना बटुआ देखा, तो पाया कि यरूशलम पहुँचने लायक़ पैसे नहीं बचे। तो एलीशा मुड़ा और पैदल घर लौट आया। जब लोगों ने पूछा क्यों, तो उसने बस इतना कहा कि रास्ते में उसके पैसे खो गए और वह अपने दोस्त के साथ नहीं चल पाया।

यरूशलम

एफ़ीम ने कुछ समय एक सराय में अपने दोस्त का इंतज़ार किया, फिर अकेला आगे बढ़ गया। वह ज़मीन और समुद्र के रास्ते सफ़र करता हुआ आख़िरकार यरूशलम पहुँचा। उसने पवित्र स्थानों के दर्शन किए और अपनी मोमबत्तियाँ जलाईं। पर फिर भी वह चिंता करता रहा, अपने पैसों की, चोरों की, घर की।

एक दिन वह होली सेपल्कर चर्च में भारी भीड़ के बीच खड़ा था। और वहाँ, वेदी के पास, सबसे आगे, जहाँ रोशनी सबसे तेज़ थी, उसने मोटे कपड़े का कोट पहने एक बूढ़े को देखा, जिसका गंजा सिर चमक रहा था।

वह एलीशा था।

एफ़ीम ने भीड़ में से धक्का देकर उस तक पहुँचने की कोशिश की, पर जब तक वह वहाँ पहुँचा, एलीशा जा चुका था। अगले दिन उसने उसे फिर देखा, उसी जगह, उसका सिर जैसे रोशनी से चमक रहा था। और फिर एफ़ीम उस तक नहीं पहुँच पाया।

घर की राह

लौटते हुए एफ़ीम उसी इलाक़े से गुज़रा जहाँ उसने एलीशा को छोड़ा था। वह एक झोंपड़ी पर पहुँचा, जहाँ परिवार भरपेट खाता-पीता था और खेत हरे-भरे थे। उन्होंने उसे अंदर बुलाया और खाना खिलाया।

फिर उन्होंने उसे अपनी कहानी सुनाई। उन्होंने बताया कि एक साल पहले वे सब भूख से मर रहे थे। एक बूढ़ा पानी पीने अंदर आया था। वह रुक गया, उन्हें खिलाया, उनकी ज़मीन छुड़ाई, उन्हें गाय और घोड़ा दिया, और फिर किसी को अपना नाम बताए बिना ग़ायब हो गया।

एफ़ीम ने सुना, और समझ गया।

घर पहुँचकर वह एलीशा से मिलने गया। वह छोटा-सा आदमी अपने बग़ीचे में छत्तों के बीच था। उसने ख़ुशी से एफ़ीम का स्वागत किया।

"मैंने तुम्हें यरूशलम में देखा था," एफ़ीम ने कहा। "सबसे आगे, वेदी के पास।"

एलीशा ने बस हाथ हिलाया और बात बदल दी। "वह सब ईश्वर का काम है," उसने कहा। "आओ, मेरी मधुमक्खियाँ देखो। इस साल उन्होंने कितना बढ़िया झुंड बनाया है।"

एफ़ीम ने झोंपड़ी वाले परिवार के बारे में कुछ नहीं कहा। पर अब वह समझ गया था कि ईश्वर से की गई अपनी मन्नतें निभाने और उसकी इच्छा पूरी करने का सबसे अच्छा तरीक़ा यही है कि हर इंसान, जब तक जिए, दूसरों से प्रेम करे और उनका भला करे।

इस कहानी के बारे में

लियो टॉल्स्टॉय (1828–1910), वॉर एंड पीस और अन्ना कैरेनिना के महान रूसी लेखक, ने 1880 के दशक में आम पाठकों के लिए आस्था, दया और अच्छी तरह जीने के बारे में कई छोटी, सरल कहानियाँ लिखीं। यह उसका एक छोटा और सरल किया हुआ पुनर्कथन है।

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